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जूट की खेती, कटाई और रेशा निकालने की तकनीक- jute ki kheti kis mausam mein ki jaati hai

जूट की खेती, कटाई और रेशा निकालने की तकनीक- jute ki kheti kis mausam mein ki jaati hai

जूट की खेती- jute ki kheti kis mausam mein ki jaati hai




वानस्पतिक वर्गीकरण (Botanical Classification)

वानस्पतिक नामकोरकोरस स्पीसीज (Corchorus sp.) कुल (Family) — टीलीएसी (Tiliaceae)

गुणसूत्र संख्या - 2n = 14

जूट उगाने के लिए गर्म और आर्द्र जलवायु आवश्यक है। 100 से 200 सेंटीमीटर वर्षा और 24 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त होता है। थैले, लिनेन के धागों और धागों के अलावा, जूट के रेशों का उपयोग कंबल, गलीचे, कालीन, ब्रश, रस्सी आदि बनाने के लिए किया जाता है। चारकोल और बारूद जूट के तनों से बनाए जाते हैं। जूट की खेती, कटाई और रेशा निकालने की तकनीक- jute ki kheti kis mausam mein ki jaati hai


वितरण एवं क्षेत्रफल-




विश्व के विभिन्न देशों में जूट की खेती प्रमुख रूप से भारत और पाकिस्तान में ही की जाती है।


भूमि चयन-




इसकी खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली समतल मिट्टी अधिक उपयुक्त होती है साथ ही पर्याप्त जल धारण क्षमता वाली चिकनी मिट्टी और चिकनी मिट्टी भी इसकी खेती के लिए अधिक उपयुक्त होती है।

जूट जी खेती


मिट्टी की तैयारी-




एक जुताई करके बुवाई के लिए भूमि तैयार की जाती है, उसके बाद स्थानीय हल या कल्टीवेटर से 2-3 जुताई करके मिट्टी भुरभुरी बना दी जाती है। चूँकि जूट के बीज बहुत छोटे होते हैं, इसलिए भुरभुरी मिट्टी का होना आवश्यक है ताकि बीज अच्छी तरह से घुस सकें। उचित मिट्टी की नमी संचय के लिए अच्छा माना जाता है।


मुख्य किस्में-




जूट की दो मुख्य किस्में हैं। प्रत्येक किस्मे  इस प्रकार हैं

- कैप्सुलर

कहीं-कहीं इसे सफेद जूट या बंबई काकीज भी कहा जाता है। इसकी पत्तियों का स्वाद कड़वा होता है। इसे फरवरी से मार्च तक बोया जाता है। प्लॉट के आधार पर निम्नलिखित प्रजातियों की सिफारिश की गई थी।

जेआरसी-321


यह शीघ्र पकने वाली प्रजाति है। यह शुरुआती बारिश और निचली जमीन के लिए सबसे अच्छा पाया गया है। जूट के बाद पछेती धान (अगनी घन) उगाई जा सकती है। इसे फरवरी-मार्च में बोया जा सकता है और जुलाई में काटा जा सकता है।

जेआरसी-212


यह मध्यम और ऊंचे भूखंडों में पछेती बुआई वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। बुवाई मार्च से अप्रैल तक की जा सकती है और जुलाई के अंत तक काटा जा सकता है।

UPC-94 (रेशमा)


फरवरी के तीसरे सप्ताह से मार्च के मध्य तक तराई में उपयुक्त बुवाई करनी चाहिए, फसल 120 से 140 दिनों में होती है।

जेआरसी-698


तराई के लिए उपयुक्त इस प्रजाति की बुवाई मार्च के अंत में की जा सकती है। इसके बाद धान की बिजाई की जा सकती है।

अंकित (NDC)


तराई के लिए उपयुक्त इस प्रजाति की बुवाई 15 फरवरी से 15 मार्च तक की जा सकती है। अखिल भारतीय के लिए अनुशंसित।

एन.डी.सी.9102


पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए अनुशंसित।

- ओलीटोरियस

इसे जूट देव या टोसा भी कहते हैं। इसकी पत्तियों का स्वाद मीठा होता है। इसका फाइबर कैप्सुलर से बेहतर होता है। उच्च पदों के लिए अधिक उपयुक्त। इसकी बुवाई अप्रैल के अंत से मई तक की जाती है।

जेआरओ-632


यह पछेती बुवाई और ऊंची भूमि के लिए उपयुक्त है। उच्च उपज के साथ, उच्च गुणवत्ता वाले फाइबर का उत्पादन होता है। इसे अप्रैल से मई के अंतिम सप्ताह तक बोया जा सकता है।

जेआरओ-878


यह प्रजाति सभी मिट्टी के लिए उपयुक्त है। बुवाई मध्य मार्च से मई तक की जाती है। यह समय से पहले फूलने के लिए अवरोधक है।

जेआरओ-7835


इस जाति में 878 के सभी गुण मौजूद हैं। साथ ही अधिक उपजाऊ शक्ति लेने से भी अच्छी उपज होती है।

जेआरओ-524 (नया)


उपरहार एवं मध्य भूमि के लिए उपयुक्त बिजाई 3 मार्च से अप्रैल तक करनी चाहिए। यह 120 से 140 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है।

कार्य आरंभ -66


इस प्रजाति की मई-जून में बुआई कर 100 दिनों में अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है।

जूट जी खेती

जूट की दोनों मुख्य जातियों का तुलनात्मक अध्ययन

पौधे का भाग


कोरकोरस कैप्सुलेरिस-सफेद देशीय जूट या सादा पाटा C. capsularis)


कोरकोरस ऑलिटोरियस सोना या तोषा जूट (C. olitorius)

1. पौधे के सामान्य गुण


पौधे 3-4 मी० लम्बे होते हैं, जलमग्न भूमियों में भी पौधे 4-5 महीने में काटने योग्य हो जाते है


पौधे 3-4 मी० लम्बे होते हैं, जलमग्न भूमियों में नहीं उगते 4-5 महीने में काटने योग्य हो जाते है

2. तना


तना बेलनाकार, हल्के अथवा गहरे हरे रंग का या गहरे लाल रंग का होता है।


बेलनाकार, हल्के अथवा गहरे लाल या भूरे रंग का होता है।

3. शाखाएँ


शाखाविहीन या कभी-कभी शाखाएँ पाई जाती है।


शाखाएँ पाई जाती है, शाखाएँ छोटी होती है।

4. पत्तियाँ


रोमरहित चिकनी (Glabrous), अण्डाकार आयात रूप लम्बा (Oblong acuminate), मोटी दांतेदार (Serrate) 5-13 सेमी0 लम्बी व 2.5-60 सेमी | चौड़ा पत्राधार (petiole ) 4-8 सेमी लम्बे व हरे से गहरे लाल रंग के अनुपूर्ण ( Stipule) 0.5-2.0 सेमी लम्बे, पत्तियाँ कड़वी, अनेक शाखाएँ।


चिकनी 6-18 सेमी लम्बी, 4-8 सेमी चौड़ी, आयात रूप लम्बा, मोटी, दाँतेदार अनुपूर्ण 0.5-1.5 सेमी लम्बे, ऊपरी भाग हरा व रंगीन, आधार रंगीन पत्तियां खाने योग्य, स्वादरहित ।

5. फूल


छोटा 0.3-0.5 X 0.5-0.6 सेमी आकार, दल (Sepals) 5, पीले या हल्के पीले, पुंकेसर 20-30, परागकण पीले या हल्के पीले, अण्डाशय गोल, 5 अण्डप (Carpis) वाला, युक्ताण्डपी (Syncarpous) बीजाण्ड स्तम्भीय (Ovule axile) एक अण्डाशय में 50 बीजांड पाए जाते हैं। वर्तिका 2-4 मिमी० लम्बी व वर्तिका 2-3 भागों में बाँटा हुआ तथा रोमिल पाया जाता है


फूल आकार में कैप्सूलेरिस से 2-2.5 गुना बड़ा पाया जाता है। बाह्य दल 5-6, रंगीन या हरे, दल 5-6, पीले, पुंकेसर 30-60, परागकोश पीले, अंडाशय लम्बा, 5-6 अंडप युक्ताडपी एक अण्डाशय में 200 बीजाड, वर्तिका 3-5 मिमी०, वर्तिका गोलाकार तथा रोमिल

6. फूल का खिलना


सूर्योदय के 1-2 घण्टे बाद।


सूर्योदय से 1 घण्टा पहले।

7. फल या सम्पुटिका


फल (Capsule) गोल, 1-5 सेमी व्यास वाली, झुर्रीदार कभी-कभी चिकनी, 5 कोष्टक वाली, हर कोष्ठक में 5-10 बीज पाए जाते हैं। प्रत्येक फल में 35-50 तक बीज होते हैं। फलियाँ गोल अण्डाकार।


लम्बाई लिए हुए, 6-10 सेमी व्यास वाली, हर एक कोष्ठक में 25-40 बीज इस प्रकार प्रत्येक फल में 120-200 बीज तक पाए जाते हैं। फलियाँ वर्तुलाकार ।

8. बीज (Seed)


आकार में छोटे चाकलेट अथवा कत्थई या भूरे रंग | के 300 बीजों का भार एक ग्राम होता है। बीज बड़े चार-पाँच कोना बीज।


कैप्सूलेरिस की अपेक्षा छोटे, बीज का रंग नीला, हरा कभी-कभी काला व 500 बीजों का भार 1 ग्राम होता

9. रेशा (Fibre)


सफेद औसतन मोटा व कमजोर।


रेशा सुनहरी रंग का सफेद, महीन, मुलायम व मजबूत।

10. अन्य


ऊँचे व निचले दोनों प्रकार के खेतों में उग सकते हैं, कुछ दिनों तक पानी सहन कर लेती है।


मध्यम व ऊँची भूमियों में उगाते हैं पानी का जमाव सहन नहीं करती।

बीज-




बीज सदैव शुद्ध एवं प्रमाणित तथा कवकनाशी रसायनों से उपचारित करके बोना चाहिए। बीज की मात्रा, बोने की विधि व जातियों के ऊपर निर्भर करती है।

बीज को बोने से पहले 5 ग्राम सेरेसान या एमोसन जे० एन० प्रति किया बीज की दर से उपचारित कर लेना चाहिए।

बोने की विधियाँ (बीज दर किग्रा/हे०)

जातियाँ


छिटक


पंक्तियों में बुआई

को० कैप्सूलेरिस


10


4

को० ऑलिटोरियस


6


2.5

बोने की विधि- अधिकतर क्षेत्रों में छिटक विधि से बुआई करते हैं। पंक्तियों में बुआई हल के पीछे या सीडड्रिल द्वारा कर सकते हैं। डिबलिंग विधि भी बोने के काम में ली जाती है। इस विधि में समय व श्रम अधिक व्यय होता है। पंक्तियों में बुआई करना प्रत्येक दृष्टिकोण से लाभदायक है। बीज सदैव मिट्टी या राख में मिलाकर छिटकते हैं व खेत की क्रॉस जुताई अर्थात् पूर्व-पश्चिम व उत्तर-दक्षिण जुताई कर देते हैं।

अन्तरण (Spacing) — जूट की जातियों के अनुसार निम्नलिखित अन्तरण रखना लाभदायक है-

ऑलिटोरियस जातियाँ- 20 x 5-7 सेमी

कैप्सूलेरिस जातियाँ- 30 x 5-7 सेमी

बोने की गहराई - बीज का आकार छोटा होता है अतः 2.5-3.0 सेमी की गहराई पर बोना चाहिए। कि अधिक गहराई पर बुआई करने पर अंकुरण नहीं हो पाएगा।

बोने का समय - विभिन्न क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधाओं और वर्षा की अवस्था के अनुसार जूट की बुआई फरवरी से लेकर जून-जौलाई तक चलती है। अगेती बुआई से उपज अधिक प्राप्त होती है।


खाद की मात्रा- jute ki kheti kis mausam mein ki jaati hai




विभिन्न मृदा की परिस्थितियों के अनुसार पोषक तत्वों की मात्रा निर्धारित करते हैं। असिंचित क्षेत्रों में नत्रजन देने पर फसल की उपज 8-16 गुनी तक बढ़ जाती है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों की अपेक्षा कम वर्षा वाले क्षेत्रों से नत्रजन के अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं। फॉस्फोरस से रेशे के गुणों (quality) में सुधार होता है तथा फल गिरने की प्रवृत्ति (lodging nature) कम होती है। जूट की फसल को पोटाश की अधिक आवश्यकता है। जिन क्षेत्रों में पोटाश की कमी होती है वहाँ पर पोटाश देने पर उपज में 1-5 गुनी वृद्धि होती है।

जातियाँ


N


P


K

ऑलिटोरियस


40-60


20-40


40-60

कैप्सूलेरिस


60-80


20-40


20-40

सिचाई




प्रीष्मकाल में बोई गई फसल की मृदा की किस्म के अनुसार वर्षा आरम्भ होने तक 2-4 सिंचाइयों की आवश्यकता पड़ती है। गर्मियों में 15-20 दिन के अन्तर पर सिंचाई देना लाभदायक है। वर्षा आरम्भ होने पर सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती व फसल वर्षा की नमी से पककर ही तैयार हो जाती है। वर्षा का वितरण ठीक प्रकार से न होने पर आवश्यकतानुसार सिचाई की जा सकती है।


निकाई-गुड़ाई खरपतवार नियन्त्रण-




फसल बोने के बाद जब पौधे 8-10 सेमी के हो जाएँ तो खेत में खुर्पी या बैलों द्वारा चलने वाले यन्त्रों से निकाई-गुड़ाई कर देनी चाहिए। छिटकवाँ विधि से केवल खुर्पी से ही निकाई सम्भव है। आवश्यकतानुसार निकाई-गुड़ाई 2-3 बार करते हैं। पहली निकाई-गुड़ाई के समय ही पौधों की छँटाई भी की जा सकती है। दूसरी व तीसरी निकाई 15-15 दिन के अन्तर पर समयानुसार करते हैं।

रासायनिक विधि से खरपतवार नियन्त्रण करने के लिए निम्नलिखित रसायनों में से किसी एक का छिड़काव करके उद्देश्य की पूर्ति की जा सकती है।

(1) अन्सार (Ansar 529 or MSMA ) - 10 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से (बरमुदा दूब घास ) को विशेष रूप से नष्ट करता है।

(2) डैकोनेट (Deconate-MSMA + Water )-10 लीटर प्रति हेक्टेयर।

(3) डेलापोन (Dalapon or Dowpon) – 8-10 लीटर प्रति हेक्टेयर ।

उपर्युक्त रसायनों की यह मात्रा 1000 लीटर पानी में घोलकर, अंकुरण के बाद: प्रति हेक्टेयर छिड़क दी जाती है। डेलापोन को बुआई से 3-4 सप्ताह के बाद कतारों में जूट के पौधों को बचाते हुए छिड़कते. हैं।


पादप सुरक्षा-




कीट एवं उनकी रोकथाम-


जूट की फसल को हानि पहुँचाने वाले कीटों में जूट का कुबड़ा, रोएँदार गिंडार, जूट का सूँडीदार घुन और नील की गिडार आदि हैं जो फसल को भारी हानि पहुंचाते हैं। इसका वर्णन नीचे दिया गया है-


जूट का कुबड़ा कीड़ा या जूट का सेमीलूपर-


यह कीट जूट उगाने वाले सभी क्षेत्रों में पाया जाता है और जून में दिखाई देता है। अगस्त तक देखने को मिलता है। फसल तीन फुट के लगभग होने पर यह कीट आक्रमण करता है और कोमल पत्तियों को खा जाता है। इसके प्रभाव से पौधे की बगल में शाखाएँ निकल आती हैं और पौधा झाड़ी के आकार का हो जाता है। इससे रेशे की उपज घट जाती है। इसकी रोकथाम के लिए 0-15 प्रतिशत भायोदान (इण्डोसल्फान 35 ई० सी० का छिड़काव बहुत लाभदायक है। इसके अतिरिक्त 0-1% न्यूवाक्रान 40 ई० सी० के घोल का छिड़काव भी काफी प्रभावशाली रहता है।


 बिहार की बालदार सूँडी-


यह कीट सभी जूट क्षेत्रों में पाया जाता है और फसल को पकती अवस्था में क्षति पहुँचाता है। रेशे और पत्तियों को यह खा जाता है। इसकी रोकथाम जिन पत्तियों पर यह हो उन्हें तोड़कर मिट्टी के तेल मिले पानी में डुबोने से की जा सकती है। इसके अतिरिक्त 0.5% पैराथी आन या इण्डोसल्फान 35 ई० सी० के घोल का छिड़काव भी सन्तोषजनक परिणाम देता है।

जूट के तने की धुन (Stem weevil) –

यह कीट सभी जूट उत्पादक प्रदेशों में मिलता है। इस कीट के मब पत्तियों को खाते हैं और काले धब्बे बना देते हैं। इसके कारण इसकी उपज कम हो जाती है। इसकी रोकथाम के लिए 0.04% थायोहान के तीन छिड़काव 20-20 दिन के अन्तर से करने चाहिए। बुआई से पहले कार्बोफ्यूरान 3% दानेदार का प्रयोग करें।


जूट का मिलीबग-


इस कीट के निम्फ और औड़ पौधे के शीर्ष में बहुत भयंकर कोट है इसकी रोकथाम के लिए डाईजनीन का 0496 पोल प्रथम लक्षण देखते ही छिड़क देना चाहिए।


बीमारियाँ एवं उनकी रोकथाम-


तना और जड़ विगलन (Stem & Root rot) -


यह रोग फफूँद द्वारा लगता है। यह रोग भूमि व बीज द्वारा जनित है। यह रोग महामारी के रूप में होता है। इसके द्वारा उपज और रेशे की किस्म में कमी आ जाती है। इसे अंगमारी रोग के नाम से भी जाना जाता है इसकी रोकथाम के लिए बुआई से पहले बीजों को एपोसन जी० एन० या कैप्टान (5 मा० प्रति किया बीज) से उपचारित करना चाहिए। फाइटालोन या ब्लाइटाक्स का 0.2% के घोल का छिड़काव भी लाभदायक रहता है।


मुदुगलन या साफ्ट रोट (Sclerotiun rollisi)-


यह भी भूमि द्वारा उत्पन्न होता है और फफूंद द्वारा लगता है। पौधे में गलन प्रारम्भ हो जाता है। यह रोग जुलाई-अगस्त के महीने में भूमि के पास के तने में लगता है। तना सफेद कवकजाल से ढक जाता है। बाद में छोटे-छोटे घेर बन जाते हैं। अन्त में पौधे मर जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए व्यावहारिक तरीका यह है कि जूट के पौधे से पुरानी और सड़न वाली पत्तियाँ हटा देनी चाहिएँ। बीज का उपचार T.M.T.D. पाउडर या बोरोनिट से (3 ग्राम/किमा) दस मिनट तक करना चाहिए।


कटाई-




सामान्य परिस्थितियों में ऑलिटोरियस जातियाँ 4-5 महीने व कैप्सूलेरिस जातियाँ 6-7 मांह में पककर तैयार हो जाती हैं। फसल की बुआई के अनुसार ही फसल की कटाई जौलाई से नवम्बर तक करते हैं।

बीज के लिए छोड़ी गई फसल की कटाई, फसल को पूर्णतया पकने के बाद करते हैं। रेशे के लिए कटाई फसल के पूर्णतया पकने से पहले ही करते हैं। देर में कटाई करने पर रेशा अच्छे गुणों को प्राप्त नहीं करता। फसल पर फूल आने से पहले कटाई करने पर भी रेशा अच्छे गुणों वाला प्राप्त नहीं होता।

फसल की कटाई फलियों के बनने पर करनी चाहिए। इस समय पर कटाई करने से उपज अधिक प्राप्त होती है व रेशा भी अच्छे गुणों वाला प्राप्त होता है।

पानी भरे क्षेत्रों में पौधों को उखाड़ लिया जाता है या पानी में ही हँसिया के द्वारा काटा जाता है। उथली भूमियों (upland) में कटाई हँसिया से ही करते हैं। कटाई करने के पश्चात् फसल को 4-5 दिन तक खेत में ही छोड़ दिया जाता है ताकि पत्तियाँ खेत में ही झड़ जाएँ। बाद में पौधों को इकट्ठा करके, छोटे-छोटे बण्डल (15-20 सेमी व्यास) बनाए जाते हैं। खेत में 4-5 दिन तक फसल को सुखाने से पौधों के सड़ाने में भी सहायता मिलती है।


जूट का सड़ाना (Retting of Jute ) —




जूट की फसल का मुख्य उत्पादन रेशा है। अतः तने से रेशों को अलग करने के लिए तनों को सड़ाया जाता है। सड़ाने की क्रिया बहुत ही सावधानी से करते हैं। क्योंकि इसका सीधा प्रभाव रेशे के गुणों पर पड़ता है ।

पौधों को सड़ाने के लिए गडरों (bundle) को 60-90 सेमी गहरे पानी में दबाया (Steeping) जाता है। गट्ठर सदैव 15-20 सेमी पानी में डूबे रहने आवश्यक हैं। ऐसा पाया गया है कि एक कुन्तल को सड़ाने के लिए 200 घन फुट पानी की आवश्यकता होती है। जूट के सड़ने की क्रिया 20-30 दिन में पूरी होती है। सड़ने की अवधि पौधों की परिपक्वता व पानी के तापमान पर निर्भर करती है। अधिक ताप पर पौधे जल्दी सड़ते हैं। चूँकि सड़ना एक जैविक क्रिया है अतः इसके ऊपर तापमान जल में लवणों की मात्रा आदि का सीधा प्रभाव पड़ता है। पानी का तापमान 85°F होने पर जौलाई में सड़ाव की क्रिया 8-10 दिन में पूरी हो जाती है।


जूट सड़ाने में सावधानियाँ (Precautions in Jute Retting)-




गट्ठरों का सड़ाव अच्छा करने के लिए निम्न सावधानियाँ रखनी चाहिएँ—

(1) फसल काटकर 4-5 दिन तक खेत में सुखानी चाहिए जिससे पत्तियाँ खेत में झड़ जाएँ व पौधों का तना थोड़ा-थोड़ा सूखकर फट जाए ताकि जीवाणु तने में आसानी से प्रवेश कर जाएँ।

(2) गट्ठरों को मन्द बहते हुए पानी में दबाना अच्छा पाया गया है। स्थिर पानी व अधिक तीव्र गति से बहता हुआ पानी सड़ाव के लिए अच्छा नहीं होता।

(3) तने का सड़ाव समान रूप से करने के लिए गट्ठरों को पहले 3-5 दिन तक जड़ों की ओर से पानी में खड़ा रखना चाहिए।

(4) जूट के गट्ठरों की मोटाई 20-25 सेमी से अधिक नहीं होनी चाहिए।

(5) पानी में दबाए गए गट्ठरों के ढेर को 4-5 दिन के अन्तर पर पलटते रहना चाहिए जिससे कि प्रत्येक गट्ठर का सड़ाव समान रूप से हो सके।

(6) सड़ाव के पानी की गहराई 60-150 सेमी तक होनी चाहिए व गट्ठरों के ऊपर सदैव 15-20 सेमी पानी खड़ा रहना चाहिए।

(7) सड़ाव शीघ्र करने के लिए अमोनियम सल्फेट व हड्डी के चूरे का प्रयोग करना चाहिए।

जूट जी खेती

(8) सड़ाव की क्रिया में रेशे के गुणों को बनाए रखना आवश्यक है। अतः गट्ठर को दबाने वाले पदार्थों व पानी जिसमें गट्टर दबाया गया है, का ध्यान रखना आवश्यक है।

(i) स्थिर पानी में आयरन अधिक होता है।

(ii) तने पर अगर पत्तियाँ गट्ठरों में एक साथ दबाई गई हैं, तो पत्तियों में पाया जाने वाला टेनिन रेशे के गुणों को प्रभावित करता है। अतः तना सदैव पत्तीरहित ही सड़ाना चाहिए।

(iii) सड़ाव का पानी स्वच्छ होना चाहिए।

(iv) पानी में गट्ठरों को दबाने के लिए आम के तने अथवा केले के तनों के स्थान पर मिट्टी अथवा पत्थर का प्रयोग अच्छा है।

तो गट्ठर पानी (v) समय-समय पर रेशे उतारकर देखना चाहिए। जब रेशा आसानी से उतर जाए से निकाल लेने चाहिएँ। अधिक समय तक गट्ठर पानी में रखने पर भी रेशे के गुण खराब होते हैं। रेशा अलग करना (Extraction) सड़े हुए पौधों से रेशा निकालने का कार्य हाथ से किया जाता है। रेशा निकालने की क्रिया निम्न दो प्रकार से सम्पन्न की जाती है—

(1) एक-एक पौधे का रेशा अलग करना (Extraction of individual plant method) – इस विधि में जूट के पौधों के भली प्रकार सड़ने के पश्चात् गट्ठरों को किनारे पर लाया जाता है और गट्ठर में से एक-एक करके पौधे के ऊपर से रेशा उतारा जाता है। रेशा उतारने के लिए पौधों के जड़ वाले भाग को भली प्रकार साफ करके अंगुलियों की सहायता से रेशा यहाँ से हटाते हैं और फिर ऊपर तक इसी प्रकार तने से अलग करते जाते हैं। इस विधि में एक आदमी एक दिन में 40 किलो रेशा निकाल लेता है।

(2) मूठा विधि (Mutta method) – जैसा कि नाम से ही ज्ञात होता है कि इस विधि में कई पौधों से एक साथ रेशा उतारा जाता है। रेशा उतारने वाला आदमी लगभग 1 मीटर पानी में खड़ा होता है और बाएँ हाथ में मूठा भरके 6-10 पौधे लेता है और दाहिने हाथ से इन पौधों की जड़ों की ओर: लकड़ी के हथौड़े से पीटता है जिसके कारण सड़ी हुई लकड़ी टूटकर अलग हो जाती है। इसके बाद इस मूठे को थोड़ा पानी में आगे-पीछे झटके के साथ हिलाया जाता है जिससे सड़ा हुआ लकड़ी का भाग पानी में बहकर अलग हो जाता है और रेशा अलग हो जाता है। इस विधि में एक दिन में आदमी 50 किलो रेशा साफ कर लेता है।

इस प्रकार तने से रेशा अलग करने के बाद; रेशा पानी में भली प्रकार साफ किया जाता है जिससे इस पर लगे हुए अन्य पदार्थ छूट जाएँ और रेशे का रंग भी साफ हो जाए। इसके बाद धूप में सूखने के लिए रेशा रस्सियों पर फैला दिया जाता है। कुछ स्थानों पर गीला रेशा एक रात तक ढेर के रूप में रखकर दूसरे दिन सूखने के लिए फैलाया जाता है। ऐसा करने से रेशे का रंग अधिक साफ हो जाता है, ऐसा अनुमान है।


उपज -




जूट की खेती में रेशे के उत्पादन का महत्त्व होता है जो कि पौधों के कुल भार का 4-5 से 7.5 प्रतिशत भाग होता है। पौधों के उत्पादन में रेशे का औसत भाग 5.5 प्रतिशत होता है। प्रति हेक्टेयर रेशे को उपज मुख्य रूप से मृदा उर्वरता, जूट की किस्म, जलवायु की अवस्था, फसल काटने का समय तथा बीमारियों और षटपाद के आक्रमण की अवस्था पर निर्भर रहती है। भारत की औसत उपज 12 से 14 कुन्तल प्रति हेक्टेयर है। सबसे अधिक प्रति हेक्टेयर उपज असम (20 कु० / हे०) में प्राप्त होती है। इसके बाद पo बंगाल में 19.51 कु० प्रति हे० उपज होती है।

जूट जी खेती


jute



https://sonucsc.com/2023/01/06/jute-ki-kheti-kis-mausam-mein-ki-jaati-hai/

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