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अरहर की खेती
अरहर की खेती

वानस्पतिक नाम - Cajanus cajan L. (केजानस कजान)

परिचय-

हमारे भोजन में प्रोटीन का विशेष महत्व है। दालें ही देश की आम जनता के लिये प्रोटीन का सबसे बड़ा स्त्रोत हैं। अरहर की खेती प्रोटीन की कमी के कारण हमारा शारीरिक तथा मानसिक विकास पूरी तरह नहीं हो पाता । अतः भोजन में दालों का होना आवश्यक है। प्रोटीन का व्यवहारिक व सस्ता स्त्रोत दालें ही हैं। दालें खाने से खनिज लवणों की पूर्ति भी हो जाती है। दलहनी फसलें उगाने से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। मूंग, उड़द, मसूर, अरहर भूमि में लगभग 30-40 किग्रा. नाइट्रोजन प्रति हैक्टेयर की दर से संचित कर सकती हैं। अल्प अवधि वाली फसलें होने के कारण सस्य सघनता (Cropping Intensity) बढ़ाकर भूमि का अधिकतम उपयोग होने में सहायक है। दलहनी फसलों को कम खाद व पानी की आवश्यकता पड़ती है इसलिये प्रति हैक्टेयर उत्पादन व्यय कम होता है, बाजार मूल्य अधिक मिलता है।

अरहर की खेती - क्षेत्रफल और उत्पादन केन्द्र-

विश्व में अरहर की खेती करने वाले मुख्य देश भारत, अफ्रीका, श्रीलंका, आस्ट्रेलिया, मलेशिया तथा वैस्टइण्डीज है। भारत में अरहर की खेती 3.6 मिलियन हैक्टेयर भूमि में होती है।

जलवायु-

अरहर नम व शुष्क दोनों ही प्रकार के जलवायु में सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है। पौधों के वानस्पतिक वृद्धि के समय नंबर गर्म जलवायु पर तो होती है। फूल आने तथा फली पकते समय तेज धूप की आवश्यकता होती है। फूल आते समय पाला पड़ने से पैदावार पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है।

अरहर की खेती - के लिए भूमि व तैयारी-

भूमि 

भूमि दोमट बलुई चिकनी अच्छे जीवांश युक्त अच्छी जलधारण क्षमता वाली अच्छी जल निकास वाली जिसका ph  मान 6 से 6.5 के बीच हो अच्छी समझी गई है अम्लीय क्षारीय तथा जलमग्न भूमियाँ इसकी खेती के लिये ठीक नहीं रहती हैं।

भूमि की तैयारी-

पहली जुताई मिटटी पलट हल से और दो तीन जुताई हीरो व टिलर से पाटते (मडा ) की सहायता से समतल करके खेत को बीज बोन योग्य बना लिया जाता है

बुआई का समय व बीज दर-

समय अवधि 

जातियाँ

अन्तरण

बीज दर

बने का समय

अगेती जातियाँ

टा० -7, टा०-17

60 x 20 सेमी०

14-15 किग्रा./है०

जुलाई के प्रथम पखवाड़े

पछेती जातियाँ

टा०-21, पूसा 84

120 x 30 सेमी०

10-12 किग्रा./है०

5 जून से जून के मध्य तक बुवाई

उन्नत किस्में-

अगेती जातियाँ-

पूसा 84, मानक, टा० 21, यू० पीo ए o  एस० -120, पन्त ए० -3, ICPL-151, पारस, पूसा-9, ICPL -87

पछेती जातियाँ-

टा०-7, टाo-17, अमर, आजाद, नरेन्द्र अरहर-1, एन० पी० (WR)-15 11CPL 8904 बहुवर्षीय अरहर की किस्म है।

बीज उपचार-

बीज को बोने से पूर्व फफूंदी नाशक रसायन जैसे थाइराम या केप्टान 2.5 ग्राम दवा प्रति किलोग्राम बीज की दर से शोधित कर लेना चाहिये। अथवा बीज को सियुडोमोनास फ्लोरिसेन्स 3 ग्राम तथा कारबेन्डाजिम 1 ग्राम को प्रति किलो बीज के साथ शोधित करना चाहिए

 कल्चर को बोने से पहले बीज को अरहर के विशिष्ट राइजोबियम कल्चर से उपचारित कर लेना 1 पैकिट (250 ग्राम) कल्चर 10 किग्रा. बीज के लिये पर्याप्त होता है। बीज में मिलाने के लिये आधा लीटर पानी में 50 ग्राम गुड़ घोल कर एक पैकिट कल्चर को मिला लें। इसके बाद इस मिश्रण को बीज के ऊपर छिड़ककर हल्के हाथ से मिलाकर छाया में सूखा कर प्रयोग करे 

खाद तथा उर्वरक-

अरहर दलहनी फसल होने के कारण उसको कम नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है। अरहर की अच्छी उपज लेने के लिये 15-20 किग्रा० नाइट्रोजन, 50-60 किग्रा० फॉस्फोरस तथा आवश्यक होने पर 40 किग्रा० पोटाश प्रति हैक्टेयर की आवश्यकता होती है। फॉस्फेट उर्वरकों जैसे सिंगिल सुपर फॉस्फेट 300 किग्रा० या डी० ए० पी० 100 किग्रा/हैक्टर पंक्तियों में बुवाई के समय चोंगा या नाई से देना चाहिये।

सभी उर्वरकों को बुवाई के समय ही पंक्ति से 5 सेमी० दूर तथा बीज से 5 सेमी० की गहराई पर कूँड़ में देना चाहिये ।

सिंचाई-

प्रायः अरहर की फसल में सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती परन्तु जून के प्रथम सप्ताह में बोई गई फसल में वर्षा प्रारम्भ होने से पहले दो या तीन हल्की सिंचाइयाँ देना जरूरी होता है। एक सिंचाई फलियाँ बनने के समय अवश्य करनी चाहिये। देर से पकने वाली किस्मों में पाले से बचाव हेतु दिसम्बर या जनवरी में सिंचाई करना लाभप्रद रहता है।

अरहर की अच्छी उपज लेने के लिये यह आवश्यक है कि खेत में जल निकास का समुचित प्रबन्ध हो। ऐसे स्थानों में जहाँ खेत में पानी खड़ा रह जाता है, वहाँ अरहर को मेड़ों पर उगाना चाहिये ।

खरपतवार नियंत्रण-

वर्षा ऋतु में अरहर की फसल में खरपतवारों की विकट समस्या हो जाती है। अरहर की फसल में प्रारम्भ के 60 दिनों तक खरपतवार नियन्त्रण बहुत ही आवश्यक होता है। अरहर में खरपतवारों के नियन्त्रण के लिये दो बार निराई-गुड़ाई करना आवश्यक है। पहली निराई, बुवाई के 25-30 दिन बाद तथा दूसरी निराई, बुवाई के 45-60 दिन के भीतर कर देनी चाहिये । खेत की अन्तिम तैयारी के समय 1 किलोग्राम बेसालीन सक्रिय अवयव प्रति हैक्टेयर का 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर भूमि पर छिड़ककर, डिस्क चलाकर मिट्टी में अच्छी प्रकार मिला देने से भी खरपतवारों का नियन्त्रण हो जाता है। अथवा पेन्डीमिथलिन (स्टाम्प) 1.0 किग्रा० सक्रिय अवयव (3.0 ली०) प्रति हैक्टर की दर से 800 ली. पानी में घोलकर बोने के तुरन्त बाद प्रयोग करें।

पादप सुरक्षा 

रोग व रोग नियंत्रण 

उकठा (Wilt)-

रोग-यह अरहर का अत्यन्त हानिकारक रोग है, जो "फ्यूजेरियम उडम" नाम के फफूंद से फैलता है। यह फफूंद फसल काटने के बाद भूमि में जीवित रह सकता है और फिर अगली फसल पर प्रकोप करता है। इस रोग से प्रभावित पौधों के ऊपरी भाग में पानी नहीं पहुँच पाता, पत्तियों पीली पड़कर गिर जाती हैं, जड़ें काली हो जाती हैं। कुछ समय बाद पूरा पौधा ही सूख जाता है। इस रोग की रोकथाम के लिये रोगी पौधों को उखाड़कर जला देना चाहिये। उस खेत में आगामी 3-4 वर्ष तक अरहर की फसल नहीं उगानी चाहिये। ज्वार के साथ अरहर की मिलवा फसल बोने से भी कुछ हद तक उकठा रोग का प्रकोप कम हो जाता है। पौधों की जड़ के पास सियूडोमोनास फ्लोरेसेन्स (P. Fluorescens strain pf-1) की 3 ग्राम मात्रा तथा कारबेन्डाजिम की 1 ग्राम मात्रा को प्रति लीटर पानी में मिलाकर उकठा रोग दिखाई देने पर प्रयोग करें प्रत्येक पौधे पर 10 मिली० दवा अवश्य पड़े।

बंध्यता मोजैक (Sterility mosaic ) -

यह रोग एक वायरस से पैदा होता है। इस रोग -का प्रकोप बढ़ता ही जा रहा है। इस रोग के कारण पौधों में पत्तियाँ अधिक लगती हैं जो आकार में छोटी होती हैं। पत्तियों का रंग हरा-पीला हो जाता है। रोगी पौधों पर फूल तथा फलियाँ नहीं लगती हैं । प्रायः पौधों की कुछ शाखायें इस रोग से प्रभावित होती हैं तथा शेष स्वस्थ होती हैं। इस रोग के वाइरस को माइट (अष्ठपदी) कीट फैलाता है। इस रोग का अभी कोई नियन्त्रण नहीं है। अरहर के पुराने या स्वयं उगे पौधों को उखाड़कर नष्ट कर देने पर रोग कम फैलता है।

पत्ती का धब्बा रोग—

इस रोग के कारण पत्तियों पर छोटे-छोटे पीले रंग के चकते बन जाते हैं जिनके बीच का भाग गहरा कत्थई होता है। बाद में पत्तियाँ मुड़कर गिर जाती हैं। इस रोग की रोकथाम के लिये पत्तियों पर 0.25 प्रतिशत इंडोफिल एम-45 का छिड़काव करना चाहिये।

तना सड़न—

यह रोग एक फफूँद के कारण लगता है। इस रोग में पौधे की जड़ें तथा तने का ऊपरी भाग तो स्वस्थ बने रहते हैं, परन्तु तने का निचला भाग सड़कर सूख जाता है और अन्त में पौधा मर जाता है । इस रोग की रोकथाम के लिये खेत में जल निकास का उचित प्रबन्ध होना चाहिये। रोग-रोधी किस्में बोनी चाहिये ।

कैंकर (Cankers)—

यह रोग भी एक फफूँद के कारण ही फैलता है। इस रोग के कारण पौधों के तने व टहनियों पर कैंकर बन जाते हैं। कैंकर के स्थान से पौधा टूट जाता है । इस रोग की रोकथाम के लिये उस खेत में 3-4 वर्ष तक अरहर नहीं बोनी चाहिये। खड़ी फसल पर 0.25 प्रतिशत इंडोफिल एम-45 का छिड़काव करना चाहिये ।

कीट व कीट नियंत्रण -

फली बेधक (Pod borer) –

इस कीट की सूँडियाँ फलियों के अन्दर घुसकर दानों को खा जाती हैं। इसकी रोकथाम के लिये डाइमेथोएट 30% दवा की 1.0 लीटर या 1.5 लीटर इण्डोसल्फान 35 ई० सी० अथवा 75 मिलीलीटर न्यूवाक्रान 40 ई० सी० को 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर की दर से दो बार छिड़काव करना चाहिये। पहला छिड़काव फली लगते ही सुरक्षात्मक रूप से कर देना चाहिये। दूसरा छिड़काव पहले छिड़काव के 15-20 दिन बाद करना चाहिये अथवा हैलियोथिस NPV 350 LE को आवश्यक पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए। फैरोमोन ट्रेप 20 प्रति है० की दर से प्रयोग कर नर कीटों को एकत्रित करके नष्ट कर देते हैं।

कटाई-

जब पौधों पर 75 से 80 प्रतिशत फलियाँ पककर भूरे रंग की हो जायें तो फसल की कटाई कर लेनी चाहिये। कटाई के बाद लगभग एक सप्ताह तक उन्हें खलिहान में धूप में सूखने के लिये छोड़ देना चाहिये। इसके बाद लकड़ी से पीटकर या जमीन पर पटक कर फलियों को पौधों से अलग कर लेना चाहिये। इन फलियों को डण्डे से पीटकर अथवा बैलों की दाँय चलाकर दाना अलग कर लेना चाहिये। दानों की सफाई के बाद उन्हें लगभग एक सप्ताह तक धूप में सुखा लेना चाहिये ताकि उनमें नमी की मात्रा घट कर 8-10 प्रतिशत रह जाये।

उपज-

अरहर की उन्नत किस्मों की उन्नत तौर-तरीकों से खेती करने पर शुद्ध फसल से लगभग 16-20 क्विंटल प्रति हैक्टेयर दाना प्राप्त हो जाता है। इससे लगभग 50-60 क्विटल लकड़ी भी प्राप्त हो जाती है।

एक बार बुवाई और 5 साल तक कमाई ही कमाई, इस तरीके से करें अरहर-

मटर को साइड क्रॉप के रूप में उगाने से किसानों को कम खर्च में 5 साल तक दोगुना मुनाफा मिल सकता है। अरहर के साथ ज्वार, बाजरा, उड़द और कपास उगाई जा सकती है। अरहर अपने आप में पोषण का खजाना है. साथ ही यह मिट्टी को पोषण भी प्रदान करता है। अरहर उत्पादन की बात करें तो लगभग 1 हेक्टेयर उपजाऊ और सिंचित भूमि से 25-40 क्विंटल तक उपज मिल सकती है। वहीं कम पानी वाले क्षेत्रों में अरहर 15-30 क्विंटल तक उत्पादन देती है। इसीलिए इसे प्रमुख दलहनी होने के साथ-साथ नकदी फसल भी कहा जाता है।

फसल चक्र (Crop Rotation)-

अरहर+ गेहूं        एक वर्ष

अरहर + उर्द+गेहूं    एक वर्ष

अरहर+ मसूर      एक वर्ष

अरहर + गेहूं -मूंग     एक वर्ष

अरहर +गन्ना     दो   वर्ष

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अरहर की खेती pdf file
https://sonucsc.com/2022/12/25/%e0%a4%85%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%96%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a5%80/

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