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पटुवा या सनई की खेती, सनई की खेती कैसे करे सनई की हरी खाद और फूलों को बेचकर होगी लाखों की कमाई,सनई की खेती कैसे करे
         सनई की खेती

Botanical classification

Botanical name- Crotolaria juncea L.

 family -Fabaceae

Chromosome number-2n = 16

महत्व एवं उपयोग(Important and Utility)-

सनई की हरी खाद और फूलों को बेचकर होगी लाखों की कमाई, सनई की खेती कैसे करे - बीज को एक रात के लिए भीगो के रखना है खेत में बीज छिटका विधि से बिजाई कर सकते है गहराई 3-4 cm रखना है हमारे देश में इसकी खेती रेशे के लिए, हरी खाद के लिए तथा दाने के लिए उगाई जाती है। जूट के बाद सनई का स्थान आता है। इसके रेशे द्वारा रस्सीया, त्रिपाल, मछली पकड़ने वाली जाल, सुतली डोरी, झोले आदि के बनाने के लिए किया जाता है। सनई हरी खाद के लिए भी प्रयोग की जाती है।

सनई से प्रति हेक्टेयर भूमि को लगभग 200 से 300 कुंटल हरा जीवांश पदार्थ और जीवांश पदार्थ सड़ने के पश्चात 60 से 90 किलोग्राम नाइट्रोजन प्राप्त होती है। सनई के हरे पौधे को जानवरों को खिलाया जाता है और हरी खाद की फसल के लिए बीज उत्पन्न करने के लिए सनई की फसल दाने के लिए भी उगाई जाती है।

उत्पत्ति एवं इतिहास(Origin and History)-

सनई के जन्म स्थान ब्रह्मा माना जाता है क्योंकि यहां पौधा जंगली रूप में पाया जाता है। कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार सनई का उत्पत्ति स्थान ब्राज़ील है। भारतवर्ष में पुराने समय से ही समय की खेती की जा रही है।

वितरण एवं क्षेत्रफल(Area and Distribution)-

सनई उष्णकटिबंधीय पौधा है। जिसकी खेती प्रमुख रूप से उष्णकटिबंधीय प्रदेशों में की जाती है। सनई का क्षेत्रफल संसार में लगभग 42. 3 करोड़ हेक्टेयर व उत्पादन 25. 4 करोड़ टन है। संसार में सबसे अधिक सनई के अंदर क्षेत्रफल रुमनिया मैं, उत्पादन रूस में व औसत उपज चीन में पाई जाती है।

भारत की औसत उपज 4.09 कुंतल प्रति हेक्टेयर है। उत्तर प्रदेश में सुनई का कुल क्षेत्रफल 2003 से 2004 के आंकड़ों के अनुसार 3874 मिलियन हेक्टेयर था तथा कुल उत्पादन 1166 मिलियन टन था। उत्तर प्रदेश में सनई के अंतर्गत सबसे अधिक क्षेत्रफल वाराणसी जिले का है।

जलवायु(Climate)-

सनई के लिए गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है। समुद्र तल से लगभग 1000 मीटर की ऊंचाई तक सनई की फसल देश के विभिन्न भागों में उगाई जाती है। सनई की फसल के लिए अधिक वर्षा का होना हानिकारक है। उन सभी स्थानों पर जहां 60 से 100 सेंटीमीटर के मध्य वार्षिक वर्षा होती है सनई की फसल को वर्षा के आधार पर सफलतापूर्वक हो गया जाता है।

साधारणतया पौधे की वृद्धि काल में उच्च तापक्रम और अधिक आर्द्रता लाभदायक होती है 70° से 80° F औसत तापमान अधिक लाभदायक होता है।

भूमि एवं भूमि की तैयारी(Land and land management)-

सनई हर प्रकार की भूमि में, जिसमें पानी ना ठहरता हो, पैदा की जा सकती है। इसकी फसल को हल्की दोमट अथवा बलुवर मृदा से लेकर भारी दोमट मिट्टी, और कपास की काली मिट्टी, एल्यूवियल आदि मृदाओं पर उगाया जाता है।

भूमि की तैयारी के लिए पहले जूताई मिट्टी पलट हल या हैरों से दो-तीन जुतई करने पर कल्टीवेटर की सहायता से 2 जुलाई अंत में रूटर चला कर खेत में पाटा चला कर समतल कर लिया जाता है।

उन्नत जातियां(Improved varieties)-

देश के विभिन्न क्षेत्रों के लिए सनई की उन्नतशील जातियां निम्न प्रकार है-

उत्तर प्रदेश - के०12, के०12 पीली

राजस्थान - के०12

मध्य प्रदेश -एम०18, एम०35 व एम०19

बिहार -बी० ई० 1

महाराष्ट्र - डी० 9

पश्चिम बंगाल - एस० टी०42,52,55 व 199

बीज(seed)-

1)हरी खाद के लिए- हरी खाद के लिए बीज दर 90 से 100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक रखते हैं।

2)रेशे के लिए - 60 से 75 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर।

3)बीज अथवा दाने के लिए- 40 से 45 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर।

बुवाई की विधि(Mathod of showing)-

हरी खाद के लिए बुवाई आमतौर पर छिटकवां विधि तथा दाने व रेशे के लिए फसल की बुवाई पंक्तियों में करते हैं। पंक्तियों में बुवाई करते समय दो पंक्तियों के बीच का अंतर 12 से 15 सेंटीमीटर रखते हैं। पौधे के बीच के अंतराल पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है। दाने के लिए पौधे के बीच 15 से 20 व रेशे के लिए 10 से 15 सेंटीमीटर का अंतरण रखते हैं।

बुवाई का समय(Time of Showing)-

हरी खाद के लिए बुवाई की सुविधाओं के अनुसार अप्रैल- जून-जुलाई तक करते हैं। दाने व रेशे की फसल के लिए बुवाई जून जुलाई के प्रथम सप्ताह तक करते हैं।

खाद एवं उर्वरक(Manure and Fertilizer)-

सनई दलहन की फसल होने के कारण अधिक नाइट्रोजन की मात्रा भूमि से ग्रहण नहीं करती है। फास्फोरस का देना आवश्यक है इसकी जड़ों की वृद्धि एवं जड़ों में पाए जाने वाले नाइट्रोजन इकट्ठा करने वाले जीवाणु की वृद्धि अधिक होती है 50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर फास्फोरस देनी चाहिए।

सनई की खेती कैसे करे- के लिए सिंचाई(Irrigation)-

अप्रैल- मई मे बोई गई फसल में वर्षा आरंभ होने से पहले एक से दो सिंचाई करते हैं।

दाने व रेशे वाली फसल के लिए वर्षा अगर शीघ्र समाप्त हो जाए या बीच में सूखा पड़ जाए तो आवश्यकतानुसार सिंचाई कर देते हैं।

खरपतवार नियंत्रण(Weed Control)-

हरी खाद के लिए उगाई गई फसल स्वयं ही खरपतवार का नियंत्रण कर लेती है अतः निराई गुड़ाई की विशेष आवश्यकता नहीं होती है।

पादप सुरक्षा(Plant Protection)-

कीट नियंत्रण(Insect Control)-

1)सनई का मोथ(Sunnhemp moth)-

यहां कीट पत्तियों को खाता है। इसके ऊपर लाल, काले और सफेद निशान होते हैं। यहां कैप्सूल में छेद करके अंदर घुस जाता है। पत्तियों और तने पर अपने अंडे देता है इसकी सुंडी फसल को अधिक हानि पहुंचाती है।

इसकी रोकथाम के लिए 5% बीएससी धूल 12 से 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बुराकना चाहिए या 0.15% इंडोसल्फान 35 ई०सी० के घोल का छिड़काव करें।

2)तना छेदक(Stem borer)-

यहां कीट पौधे के उपरोक्त भाग में छेद करके पौधे को क्षति पहुंचाती है ।

इसकी रोकथाम के लिए 5% बीएससी धूल 12 से 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बुराकना चाहिए या 0.4% डायजिनान के घोल का छिड़काव करें।

3)लाल रोएंदार सूंडी(Red hairy caterpillar)-

यहां लाल बालों वाली सुंडी पत्तियों को खाती है यहां सुंडी अंकुरित होते हुए बीज को भी खा जाती है।

इसकी रोकथाम के लिए 5% बीएससी धूल 20 से 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बुराकना चाहिए या 0.15% इंडोसल्फान 35 ई०सी० के घोल का छिड़काव करें।

रोग नियंत्रण(Disease Control)-

1)गेरुआ या रतुआ(Rust)-

यहां रोग फफूंद से लगता है पौधे की सभी वायुवीय भागों पर फफोले दिखाई देते हैं। इसका रंग कुछ पीला- भुरा होता है। धब्बे बिखरे रहते हैं व बाद में काले- भुरे हो जाते हैं।

इसके रोकथाम के लिए 0.2% डाइथेन एम 45 के घोल का छिड़काव करें।

2)मोजैक(Mosaic)-

यहां विषाणु द्वारा लगने वाली बीमारी है पत्तियां इससे प्रभावित होती है। और इनमें मोड आ जाते हैं तथा कुरूप हो जाती है। फसल की पैदावार घट जाती है।

इसके रोकथाम के लिए रोगी पौधों को उखाड़ कर फेंक देना चाहिए तथा उचित फसल चक्र अपनाना चाहिए

3)उकठा(Wilt)-

यहां रोग फफूंद द्वारा लगता है। पत्तियां पीली पड़ जाती है। यहां रोग अक्टूबर में दिखाई देता है और पूरा पौधा मुरझा जाता है बाद में नष्ट हो जाता है।

बीज बोने से पहले एग्रोसन जी० एंन० से उपचारित कर लेना चाहिए। तथा रोगी पौधों को उखाड़ कर फेंक देना चाहिए तथा उचित फसल चक्र अपनाना चाहिए।

कटाई(Harvesting)-

1)हरी खाद के लिए कटाई-

फसल बोने के 50 से 60 दिन बाद फसल खेत में पलट दी जाती है। अप्रैल-मई में बोई गई फसल जून-जुलाई में खेत में पलट देते हैं। फूल आने पर फसल की पलटाई खेत में करने से अधिक मात्रा में जीवांश व नाइट्रोजन का योग मृदा में होता है डिस्क हैरो चलाकर फसल को भूमि के साथ मिला दिया जाता है।

2)रेशे वाली फसल-

बोने के 10 से 12 सप्ताह बाद रेशे के लिए फसल की कटाई करते हैं। पहले कटाई करने पर रेशा कच्चा प्राप्त होता है तथा उपज में भारी कमी होती है। व बाद में कटाई करने पर रेशा अच्छे गुणों वाला प्राप्त नहीं होता है। सितंबर में इस फसल की कटाई कर लेते हैं।

3)बीज या दाने वाली फसल-

फलियों में बीज जब कठोर व काला हो जाए तभी फसल की कटाई दाने के लिए करते हैं इस अवस्था पर फलीया सूख जाती है। व बीज अपने र्वन्त से अलग हो जाता है। हंसिया से कटाई करके फसल से सूखे दंड की सहायता से बीज अलग कर लेते हैं। सूखे तने को पानी में गला कर निम्न गुणों का रेशा भी प्राप्त हो जाता है।

सड़ाना वह रेशा अलग करना(Rating and extraction of fibres)-

सनई के गट्ठरो को सड़ाने व तने से अलग करने की क्रिया जूठ के समान ही है। सड़ाने में केवल इतना ही है कि सनई के पौधे कम समय में सड़ जाते हैं सामान्य अवस्था में 6 से 8 दिन का समय सड़ाने की क्रिया में लगता है। गट्ठो को सड़कर रेशा अलग करने से पहले साफ पानी में धोया जाता है व बाद में रेशा लग कर लिया जाता है।

उपज(Yield)-

हरी खाद की फसल से 200 से 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक जीवांश प्राप्त हो जाता है। रेशे वाली फसलों से 8 से 12 कुंटल तक रेशा प्रति हेक्टेयर, दाने वाली फसल से 8 से 10 कुंटल दाना प्रति हेक्टेयर प्राप्त हो जाता है।

सनई की खेती कैसे करे -> pdf file →

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