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चुकन्दर (Sugar Beet) की वैज्ञानिक खेती- chukandar ki kheti kaise ki jaati hai
chukandar ki kheti kaise ki jaati hai

Botanical classification-

Botanical name-  Beta vulgaris L.

 family-  Chenopodiaceae

 chromosome number-2n = 90

महत्व एवं उपयोग-

चुकंदर सब्जी के रूप में अमेरिका एवं यूरोप में काफी प्रचलित है। chukandar ki kheti kaise ki jaati hai भारत में चुकंदर की सब्जी के रूप में उतना प्रमुख नहीं है। जितना की मूली गाजर एवं शलजम है। चुकंदर को कच्चा सलाद के रूप में दूसरी सब्जियों के साथ मिलाकर खाया जाता है। आजकल चुकंदर की खेती शर्करा प्राप्त करने के लिए की जाती है। चुकंदर में खनिज पदार्थ एव विटामिन सी की प्रचुर मात्रा पाई जाती है।

संसार में चीनी की पूर्ति का 40% भाग चुकंदर से प्राप्त चीनी के द्वारा ही होता है। ठंडे देशों में चीनी का मुख्य स्रोत चुकंदर ही है।

उत्पत्ति एवं इतिहास-

सनम 1746 में एक जर्मन वैज्ञानिक ओड्रिआस सिगिसमोड मार्गफ ने अपनी प्रयोगशाला में चुकंदर से चीनी बनाई।  फ्रांसीसी वैज्ञानिकों ने चुकंदर से चीनी बनाई इसके बाद यहां यूरोप के अन्य देशों , रूस व संयुक्त राज्य अमेरिका  मैं प्रारंभ हुआ।

भारत में चुकंदर की खेती लगभग 3 दशक पूर्व सन 1974 में किए गए थे। भारतीय गन्ना संस्थान लखनऊ से 1959 से 60 में चुकंदर पर अनुसंधान कार्य प्रारंभ किया गया। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (I.C.A.R.) ने ऑल इंडिया कोऑर्डिनेटेड शुगर बीट प्रोजेक्ट की स्थापना की और इसमें 1970 में अपना कार्य प्रारंभ किया। पंतनगर, लखनऊ, कानपुर व श्रीनगर मैं अनुसंधान के केंद्र रखे गए। जालंधर, श्रीनगर व हिसार उपअनुसंधान केंद्र के रूप में रखे गए। व्यापारिक दृष्टिकोण से शुगर मिल लिमिटेड श्रीगंगानगर, राजस्थान वह फल्टन शुगर वर्कर्स लिमिटेड सखार वाड़ी महाराष्ट्र के क्षेत्र में चुकंदर की खेती प्रारंभ की गई।

वितरण एवं क्षेत्रफल-

चुकंदर मुख्य रूप से रूस, फ्रांस, अमेरिका, पोलैंड, स्पेन, टर्की व जर्मनी में उगायी जाती है। क्षेत्रफल की दृष्टि से रूस व अमेरिका का मुख्य स्थान है। विश्व के प्रमुख देशों में चुकंदर का क्षेत्रफल 86.6 लाख हेक्टेयर तथा उत्पादन 2616.5 लाख टन के लगभग है।

जलवायु(Climate)-

ठंडे देशों में इसकी खेती ग्रीष्म ऋतु में की जाती है । जिन देशों में गर्मियों में तापमान अधिक हो जाता है। वहां पर इसकी खेती सर्दियों में करते हैं। उच्च तापक्रम के साथ आद्रता तक की जा सकती है। 30 से 60 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र इसकी खेती के लिए उपयुक्त है। चुकंदर के लिए इष्टतम तापमान 50 - 60°F है। तापमान अधिक होने पर जड़ों में चीनी की मात्रा कम होने लगती है।

वृद्धि के लिए समय शुुष्क मौसम चमकीला दिन व रात में ठंडक होना अति उत्तम है। तापमान शून्य से कम होने पर पत्तियों को हानि हो सकती है। बर्फ पड़ने पर पत्ते मर जाती है।

मृदा(Soil)-

दोमट व बलुई दोमट मृदा चुकंदर के लिए अच्छी मानी जाती है। भारी (चिकनी )मृदा में भी इसकी खेती सफलतापूर्वक की जाती है। परंतु खुदाई के समय जड़ो से मिट्टी की सफाई करने में कठिनाई उत्पन्न होती है।

चुकंदर लवणीय मृदा में भी आसानी से उगाया जा सकता है। इस प्रकार उत्तरी भारत की क्षारीय री मृदाओं में जिनका क्षेत्रफल पंजाब , हरियाणा , उत्तर प्रदेश व राजस्थान में 28 लाख हेक्टेयर है इनकी खेती की जाती है।

भूमि की तैयारी-

खरीफ की फसलों के बाद एक जूताई गहरी मिट्टी पलटने वाले हल या हैरों से 3-4 जुताई हरो से करने पर कल्टीवेटर की सहायता से 2 जुताई उसके बाद पाटा चलाकर खेत को समतल कर लिया जाता है।

उन्नत जातियाँ-

विदेशों (अमेरिका, रूस, जर्मनी, इंग्लैण्ड, स्वीडन व डेनमार्क) से चुकन्दर की जातियाँ मंगाकर, अपने देश में परीक्षण करके निम्नलिखित जातियों को अपने यहाँ अनुकूल पाया गया है 1

ईरो टाइप इ, मेरोबी मेरोक पोली, इग्लोपोली, एन० पी० पोली, ए० जे० पोली, मेरोबी मेगना यांनी रोमांस काया, बुश० ई० ट्रिपलक्स, यू० एस० एच० 6, यू० एस० एच० ४, यू० एस० एच० १, बी० जी० डब्ल्यू 674, यू० एस० 75, यू० एच० 35, 66; एम० एस० एच० 102 आदि। पन्तनगर वि० बि० द्वारा भी चुकन्दर की कुछ जातियाँ विकसित की गई हैं। इनमें से पन्त एस० 1, पन्त एस० 2, पन्त एस० 3, पन्त एस० 10, पन्त कम्पोजिट 6; पन्त कम्पोजिट । व पन्त कम्पोजिट 3, II.S.R. -Comp. 1, 1-5-6 पूरे भारत में उगाने के उपयुक्त है। लवणीय भूमियों में Pant S. 1, Pant S.10, LLS. R Comp. 1 एवं 1.I.S. R-2 उगाने के लिए उपयुक्त है ।

बीज(Seed)-

बीज सदैव कवकनाशी रसायनो से उपचार करके बोना चाहिए। साधारणतया एक अंकुर वाली जातियों में 5 - 6 किलोग्राम तथा बहू अंकुर वाली जातियों में 10 से 12 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता पड़ती है।

बोने का समय व अंतरण-

चुकंदर बोने का समय 15 अक्टूबर से 15 नवंबर तक बुवाई करनी चाहिए। दिसंबर में बुवाई करने पर उपज में भारी कमी आती है। बीज के लिए बुवाई 15 अप्रैल अच्छा माना जाता है।

प्रति हेक्टेयर 80000 से 100000 पौधे रखना आवश्यक रखना लाभदायक है । इसके लिए पंक्तियों से पंक्तियों की दूरी 40 -60 सेंटीमीटर पर पौधे से पौधे की दूरी 20 - 25 सेंटीमीटर रखनी चाहिए।

बोने की विधि-

चुकंदर की बुवाई समतल खेत में मेड़ों पर की जाती है। चुकंदर बोने वाले सीडड्रिल उपलब्ध हो तो उससे सीधे मेड़ो  पर यह समतल खेत में बुवाई की जाती है। तथा इसकी बुवाई देसी हल या किसी हल्के यंत्र द्वारा ऐच्छिक दूरी पर कूंड में बोई जाती है। इनमें 10 से 20 सेंटीमीटर के अंतर पर बीजों की बुवाई कर देते हैं। बोने से पहले बीजों को रात भर 8 से 10 घंटे पानी में भिगोना चाहिए।

बोने की गहराई-

मेड़ो पर या समतल खेत में बुवाई 2 से 3 सेंटीमीटर की गहराई पर करनी चाहिए। अधिक गहरी बुवाई करने पर अंकुर में अच्छा नहीं होता है।

बिरलीकरण या पौधे की छंटाई (Thinning)-

प्रत्येक बीज को एक से अधिक पौधे निकलते हैं अतः बिरलीकरण करना आवश्यक हो जाता है। जब पौधे 5 सप्ताह के हो जाए तो पौधों को पंक्तियों में 20 से 25 सेंटीमीटर की दूरी बनाकर  बिरलीकरण कर देना चाहिए। इस प्रकार एक हेक्टर में 80000 से 100000 पौधे रखे जाते हैं। बिरलीकरण की समस्या को कम करने के लिए अधिकतर एक अंकुरण वाले किस्मों को होना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक-

चुकंदर के खेतों के लिए 200 से 300 कुंटल गोबर की खाद चुकंदर की बुवाई के 1 महीने पहले खेतों में अच्छी प्रकार से मिला देनी चाहिए।

चुकंदर की फसल को 120 किलोग्राम नाइट्रोजन 60 से 80 किलोग्राम फास्फोरस तथा 40 से 60 किलोग्राम पोटाश देना चाहिए।

नाइट्रोजन की एक तिहाई मात्रा फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय खेतों में मिला देते हैं । बची नाइट्रोजन की मात्रा पहले पानी और दूसरे पानी में खेत में छिड़काव कर देनी चाहिए।

सिंचाई एवं जल निकास-

चुकंदर की फसल में पहली दो सिंचाई बुवाई के 15 से 20 दिन के अंतर पर करते हैं । बाद में फसल की कटाई तक 20 से 25 दिन के अंतर पर सिंचाई करते रहना चाहिए। तथा चुकंदर में जब कंद बनते समय सिंचाई का विशेष ध्यान रखा जाता है, अन्यथा उपज में कमी आ जाती है।

निराई गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण-

फसल बोने के 60 दिन तक फसल को खरपतवार से मुक्त किया जाता है। बुवाई के 30 दिन बाद पहली निराई गुड़ाई खेत में कर देनी चाहिए। दूसरी निराई  बुवाई के 55 दिन बाद करते हैं।

रासायनिक विधि से खरपतवार का नियंत्रण करने के लिए 2 किलोग्राम बीटानेल बोने के 30 दिन बाद या पायरेमीन 2 किलोग्राम अंकुरण से पूर्व प्रयोग करना चाहिए।  पायरेमीन चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार को नष्ट करता है। बीटानेल दवाई वायु ना चलने पर पौधे को धूप लगने के बाद प्रयोग करना चाहिए।

सिरमेट नमक दवाई 2 किलोग्राम अंकुरण से पूर्व 800 लीटर पानी में घोलकर भूमि की नाम सतह पर छिड़काव करना चाहिए।

मिश्रित खेती-

शरद कालीन गन्ने में दो पंक्तियों के बीच एक पंक्ति चुकंदर की उगा सकते हैं । इस प्रकार एक खेत में एक समय में शर्करा वाले दो फसलें उगाकर प्रति इकाई शर्करा का उत्पादन बढ़ा सकते हैं।

रोग एवं रोग नियंत्रण-

1) मूल विगलन(Root rot)-

यह रोग फफूंद से लगता है। सफेद रूई की तरह कवक जाल जड़ों की सतह पर भूमि की सतह में कई सेंटीमीटर की गहराई पर दिखाई देती है। इससे जुड़े और तने में गलन लग जाती है।

इसकी रोकथाम के लिए बोने के 3 महीने के बाद ब्रेसिकाल 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 300 लीटर पानी में घोलकर खेतों में छिड़काव कर देनी चाहिए। 2 से 3 वर्ष का फसल चक्र अपनाना चाहिए।

2)पत्तियों का चित्ती रोग(Leaf spot)-

यहां बीमारी कवक से लगती है। पत्तियों पर गहरे कत्थई रंग या काले रंग के गोलाकर धब्बे उभरते हैं । कम ताप अधिक नमी वातावरण में होने पर यहां रोग अधिक लगता है।

इसकी रोकथाम के लिए बीज को सदैव कैप्टन या थीरम द्वारा 0. 25% की दर से उपचारित करना चाहिए।

डायथेन M-45(मिनेब) या डायथेन Z -78 (जिनेब) 0.25% का घोल 10 से 15 दिन के अंदर छिड़काव करना चाहिए।

कीट नियंत्रण-

1)कट वार्म या कटुआ-

इस कीट के पतंगे व सुंडी अक्टूबर-नवंबर व फरवरी-मार्च में फसल को हानि पहुंचाते हैं । रात में यह पौधे को खाते हैं तथा दिन में भूमि की ऊपरी परत में छिप जाते हैं।

इसकी रोकथाम के लिए हेप्टएक्लोर 5% की 20 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर, बुवाई के समय भूमि मिला देनी चाहिए।

2)तम्बाकू की सुंडी-

उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में इस कीट की गिंडार का प्रकोप बहुत अधिक पाया जाता है । यहां सुंडी पत्तियों को खाती है तथा चुकंदर की फसल को अत्यधिक हानि पहुंचाती है।

इसकी रोकथाम के लिए सेविन 50% डब्ल्यूपी की 2 किलोग्राम मात्रा का 600 से 800 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करना चाहिए।

3)बिहार हेयरी केटरपिलर-

स्केट की सुंडियों का आक्रमण फसल की पत्तियों पर होता है। पत्ते समाप्त होने पर इसका आक्रमण जड़ों पर भी हो जाता है। यहां पत्ती को अत्यधिक खाकर नुकसान पहुंचाती है।

इसकी रोकथाम के लिए 1 पॉइंट 25 लीटर थायोडान 35 ई०सी० को 600 से 800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करनी चाहिए।

4) ग्रीन पीच एफिड-

दिसंबर से फरवरी तक यह कीट पत्तियों का रस चूसता है‌। इसकी रोकथाम के लिए मेटोसिस्टाक्स 25 ई०सी० के 1 लीटर का 600 से 800 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर छिड़कना चाहिए।

खुदाई-

बुवाई के 5 से 6 महीने बाद फसल पक कर तैयार हो जाती है। परिपक्वता के आधार के समय पत्तियां सूख जाती है। खुदाई से 15 दिन पहले सिंचाई रोक देते हैं । खुदाई करने के लिए ट्रैक्टर से खींचे जाने वाले सोयलर या हत्थी वाले कल्टीवेटर या मोल्डबोर्ड हल या देशी हल का प्रयोग किया करते हैं। चुकंदर की पत्तियां ऊपर से काट ली जाती है। ऊपर की पत्तियां पशुओं को खिलाने के लिए काम में लाया जाता है। जड़ों की धुलाई फैक्ट्री में ही मशीनों से कर ली जाती है। खुदाई के 60 घंटे बाद तक जड़े, प्रोसेसिंग उपयुक्त रहती है।

उपज(Yield)-

चुकंदर की अच्छे देखरेख करने पर जड़ों की उपज 300 से 500 कुंतल प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त हो जाती है । जड़ों में चीनी की मात्र 13 से 17% तक पाई जाती है।

फसल चक्र-

चुकन्दर + धान    1वर्ष

चुकन्दर + मक्का    1वर्ष

चुकन्दर + बाजरा + लौकि   1वर्ष

चुकन्दर + गन्ना    2 वर्ष

चुकन्दर + गन्ना + पेड्डी   3 वर्ष

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