
कपास की खेती
वानस्पतिक नाम(Botanical name)-Gossypium species
कुल(Family)-Malvaceae
प्रस्तावना-
कपास खरीद ऋतु में बोई जाने वाली ऋषि की अत्यंत महत्वपूर्ण फसल है सूती कपड़े का यही एकमात्र साधन है। कपास की खेती pdf हमारे देश में आदिकाल से होती आई है। और ऋग्वेद में कपास की अनेक स्थानों पर चर्चा की जाती है।
भारतीय कपास का वर्गीकरण (Classification of Indian Cotton)-
खेती करके उगाए जाने वाले कपास को चार मुख्य भागों में बांटा गया है-
1)Gossypium hirsutum
2)Gossypium barbadence
3)Gossypium herbaceum
4)Gossypium arboreum
कपास हमारे देश में बड़े पैमाने पर उगाई जाती है। इसे 3 किस्मों में विभाजित किया जाता है-
A) वैरायटी टीपीकम(Variety typicum)-
B)वैरायटी नैगलैक्टम(Variety neglectum )
C)वैरायटी सरनम(Variety cernum)
क्षेत्रफल और उत्पादन केंद्र (Areas and centres of cultivation)-
भारतवर्ष में कपास की खेती लगभग 8 .5 मिलियन हेक्टर में होती है तथा 9 .5 मिलियन गांठें पैदा होती है ।यहां देश कपास के विश्व उत्पादन में लगभग 27% का भागीदार है। क्षेत्रफल की दृष्टि से कपास उगाने वाले देशों में भारत का प्रथम स्थान है।
हमारे देश में कपास की खेती महाराष्ट्र में सबसे बड़े क्षेत्र में होती है ।इसके बाद आंध्रप्रदेश ,हरियाणा, गुजरात ,कर्नाटक ,मध्य प्रदेश और पंजाब का नंबर आता है ।कपास के प्रति हेक्टेयर उत्पादन की दृष्टि से पंजाब राज्य देश भर में सबसे आगे है।
उत्तर प्रदेश के विभिन्न मंडल में कपास की खेती इस प्रकार है-
कपास की खेती पश्चिमी क्षेत्र में मेरठ मंडल में कपास सबसे अधिक उगाई जाती है।
आगरा मंडल दूसरा नंबर पर आता है।
हमारे राज्य में बुलंदशहर जिले में कपास की खेती सबसे अधिक क्षेत्रफल में होती है ।इसके बाद अलीगढ़ ,मथुरा और मेरठ में कपास की खेती की जाती है।
जलवायु(Climate)-
कपास एक उष्णकटिबंधीय फसल है, कपास की बढ़वार की अवस्था में उच्च तापमान व प्रार्थना में की आवश्यकता होती है इसके बढ़वार के लिए 21 - 27 °C तापमान होना चाहिए।
कपास के लिए तापमान की न्यूनतम सीमा 20°C है।
तथा अधिकतम 30 से 35 डिग्री सेल्सियस उपयुक्त मानी जाती है।
भूमि व भूमि की तैयारी-
कपास की खेती के लिए उचित जल निकास वाली तथा उपयुक्त जल धारण क्षमता वाली भूमिया अच्छी मानी जाती है भारत में कपास की मुख्यता काली मिट्टी जलोढ़ मिट्टी लाल मिट्टी और लेटराइट मिट्टी में उगाई जाती है ।जिस का पीएच मान 5.5 से 8.5 तक हो।
भूमि की तैयारी के लिए 3-4 जुताई हैरों से करनी करते हैं तथा उसके उपरांत 3 से 4 जुलाई कल्टीवेटर और अंत में रूटर लगाकर खेत में पता चला देनी चाहिए।
कपास की उन्नत किस्में या जातियां-
क्षेत्र
जातियाँ / वर्ग
संस्तुत उन्नत किस्में
1. उत्तरी क्षेत्र
अमेरिकन कपास
प्रमुख, बीकानेरी नर्मा, एच० 777, एफ० 414, एच० एस० 45, संकर 4, गंगानगर अगेती, एच० एस० 6, संकर- 10
देशी कपास
श्यामली, लोहित, जी० 27, एल० डी० 133, एच० डी० 107
2. मध्य क्षेत्र
अमेरिकन कपास
वारालक्ष्मी, संकर- 4, सावित्री, गोदावरी
देशी कपास
संजय, दिग्विजय
3. दक्षिणी क्षेत्र
अमेरिकन कपास
महालक्ष्मी, कृष्णा, लक्ष्मी, सुजाता, हाइब्रिड- 4, सुविन, एम० सी० यू० 5, 6, 8 व 9, अंजली
देशी कपास
गोरानी, जयाधर
क)उत्तर प्रदेश के लिए उन्नत किस्में-
जी 27, श्यामली, लोहित, एल०डी०133
ख) अमेरिकन कपास की उन्नत किस्में-
एच०777, एस० एच० 131, प्रमुख, हाइब्रिड -4, एच०14, बीकानेरी नरमा ,एच०डी०107 ,एच एस -6
कपास के गुण-
रेशे की लंबाई, रेशे की बारीकी, रेशे की शक्ति अथवा तनाव मजबूती, रेशे की परिपक्वता ,रेशो की पेज की संख्या, धागे की समानता, काउंट्स की संख्या, गांठों की अवस्था, रुई का प्रतिशत ,चिकनापन ,धागे का रंग ,कपास की आद्रता तथा बाहरी अशुद्धियां।
बीज का उपचार(Seed Treatment)-
सर्वप्रथम हमें स्वस्थ बीज लेनी चाहिए ,तथा उस बीज को देखनी चाहिए कि बीच में कोई कीड़े मकोड़े आदि बीमारियों का प्रकोप ना हो ,फिर हम उस बीज का ट्रीटमेंट करते हैं कैप्टन याद थाएराम की 3% घोल में हम बीज को उपचारित करते हैं।
बीज को सेरेसन या एग्रोसन जी०एन० 2.5 ग्राम प्रति किलो से बीज का उपचार करते हैं
बीज की मात्रा(Seed Rate)-
देसी कपास के लिए 15 से 18 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर
अमेरिकन कपास के लिए 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर
अंतरण(Spacing)-
देसी जातियां 60 ×30 सेंटीमीटर
अमेरिकन जातियां 60 × 45 सेंटीमीटर से 75 से 90 सेंटीमीटर
दक्षिण भारत में अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए लगभग 50000 पौधे प्रति हेक्टेयर होने चाहिए।
बोने की विधि(Sowing Mathod)-
कपास को अधिकतर समतल क्यारियों में उगाते है। मेड़ों पर उगाना से सिंचाई के पानी में बचत जल निकास में सहायता व उपज में की वृद्धि होती है।
1) छिटकवा विधि
2) हल्के पीछे पंक्तियों में बुवाई
3) डिबलिंग विधि
4) ड्रिलिंग विधि
बोने की गहराई मृदा में पर्याप्त नमी होने पर 4-5 सेंटीमीटर रखनी चाहिए।
बोने का समय देसी कपास में 5 अप्रैल से मध्य मई तक तथा अमेरिकन कपास की जातियों को 15 अप्रैल तक बो देना चाहिए।
खाद एवं उर्वरक (Manure and Fertilizer)-
कपास की खेती के लिए 10 से 12 टन प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद देनी चाहिए। यहां जुताई के समय खेतों में मिला देनी चाहिए।
80 से 100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 70 किलोग्राम फास्फोरस तथा 60 किलोग्राम पोटाश रासायनिक खान कपास की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
सिंचाई(Irrigation)-
कपास में प्रथम सिंचाई 45 से 50 दिन बात करते हैं ।तथा सिंचाई पौधे के लिए अत्यधिक आवश्यक है ।कपास की फसलों में 15 से 20 दिन के अंतर पर सिंचाई करते रहना चाहिए जिससे हमारी फसल की पैदावार अच्छी होती है।
तथा फूल आते समय सिंचाई का विशेष ध्यान रखा जाता है। और गूलर या कॉटन बनते समय सिंचाई का विशेष ध्यान रखा जाता है । जिससे हमारे ऊपर में वृद्धि होती है।
निराई गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण-
पौधे की ऊंचाई 8-10 सेंटीमीटर होने पर पहले निराई गुड़ाई करते हैं। आवश्यकता पड़ने पर एक से दो निराई गुड़ाई फूल आने तक करते हैं। तथा पंक्तियों के बीच बीच में बैलों से चलने वाले अंतरण निराई गुड़ाई करते रहते हैं।
रसायन द्वारा भी खरपतवार नियंत्रण किया जाता है । बुवाई से पहले बेसालिन 1.00 किलो सक्रिय मात्रा को 800 से 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव कर देना चाहिए।
मिश्रित खेती(Mixed Crooping)-
विभिन्न क्षेत्रों में कपास को मूंग, उड़द ,लोबिया ,ज्वार, अरहर, तिल आदि के साथ मिलाकर बोलते हैं कुछ क्षेत्र में मक्का, मूंगफली, सोयाबीन, मिर्च व अरंडी भी कपास के साथ बोते हैं।
कपास में बीमारियां एवं उनकी रोकथाम-
1)म्लानि(Wilt)-
यहां रोग मृदा के 20 से 30 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान पर अधिक फैलता है। बीमारी के प्रभाव से पौधे पीले पड़ जाते हैं। पत्तियों का रंग पहले किनारे की ओर से उड़ता है। अंत में पौधे भी सूख जाते हैं।
इसकी रोकथाम के लिए बीज को फफूंदी नाशक दवा जैसे कैप्टन या बावस्टीन से उपचारित करें। रोग रोधी जातियां उगाए । मृदा में जिंक की कमी को दूर करें । उचित फसल चक्र अपनाएं।
2)जड़ सड़न(Root Rot)-
जिन मृदा में तापमान अधिक होता है ।वहीं पर यहां बीमारी अधिक लगती है ।इसका प्रकोप होने पर पौधे मुरझा जाते हैं जड़ सड़ जाती है।
इसकी रोकथाम के लिए ब्रेसीकॉल की 5 ग्राम मात्रा प्रति किलो बीज में शोधित करते हैं । तथा समय पर सिंचाई करें।
3) जीवाणु झुलसा (Blight)-
यहां बीमारी बैक्टीरिया के द्वारा फैलती है ।उत्तरी भारत में यहां बीमारी बीज द्वारा फैलती है ।यहां रोक लगने से कपास में अत्यधिक हानि होती है। तथा उपज पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
इसके रोकथाम के लिए बीज को उपचारित करके बोना चाहिए । तथा विभिन्न कीटों से इनकी रोकथाम करनी चाहिए ।
कपास के कीट एवं उनकी रोकथाम-
हरा तेरा(Jassids)-
यहां एक छोटे छोटे आकार का हरे रंग का कीट होता है। जिसे फुदका भी कहते हैं । इस कीट की प्रौढ़ एवं बच्ची दोनों पत्तियों का रस चूस कर फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं तथा इससे पत्तियां पीली पढ़ने लगती है तथा मुड़ती व सिकुड़ति है।
इसकी रोकथाम के लिए खेतों में जब यह कीड़ा दिखाई दे तो 250 से 300 ml. डाईमेक्रन 100 या 1 लीटर रोगोर
30 ई० सी० या 1 लीटर मेटा सी स्टॉक्स 25 ई०सी० का 1000 लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर 1 हेक्टेयर क्षेत्रफल में समान रूप से छिड़काव करना चाहिए
चितकबरी सुंडी (Spotted boll worm)-
स्केट की सुंडी फसल को शुरू की अवस्था में जब पौधे छोटे होते हैं ।तो सुंडी अंडे से निकलकर पौधे के ऊपरी मुलायम भाग में छेद कर के अंदर घुस कर खाती है तथा बाद में पौधा सूख जाता है। और पौधे पर गलियां में फूल आने शुरू होते हैं तो सुनने उन्हें खाकर हानि पहुंचाती है।
इसकी रोकथाम के लिए कपास के खेतों के आसपास खरपतवार ओं को नष्ट कर देना चाहिए जिससे वहां अपने जीवनकाल पूर्णा कर सकें
उचित फसल चक्र अपनाएं
इस कीट का प्रकोप अधिक होने पर 2 किलोग्राम सेविंन 50% घुलनशील पाउडर या 1 लीटर मोनोक्रोटोफॉस 40 ई०सी० अथवा 1.25 लीटर इण्डोसल्फान 35 ई०सी० अथवा साइपरमैथिन का घोल बनाकर एक हेक्टर क्षेत्रफल में छिड़काव कर देना चाहिए।
कपास के गुलाबी सूंड़ी(Pink boll worm)-
यहां कीट संसार के सभी कपास उगाने वाले क्षेत्र में पाया जाता है और इस फसल का सबसे भयंकर दुश्मन है। प्रवकील कीट पतंगा होता है ।शरीर धूसर रंग का होता है। जिस पर विभिन्न आकार के गहरे धब्बे होते हैं यह गुलाबी रंग की सुंडी होती है। यहां फसल के कलियों तथा फूलों के डंडों के अंदर घुस कर खाती है जिससे फसल अधिक नुकसान होता है।
इसकी रोकथाम के लिए बुवाई के पहले बीज को मेथिल ब्रोमाइड 5 ml. प्रति कुंतल बीज दर से सल्फास के साथ टिकिया प्रति मेट्रिक टन बीज के हिसाब से बीजों के बीच रखना चाहिए। जिससे यहां बीजों के बीच की कीड़े मकोड़े सब खत्म हो जाए।
साइपरमैथरीन या क्लोरोपारिफास का छिड़काव करना चाहिए।
चुनाई (Packing)-
कपास की फसल में लंबे समय तक फूल आते रहते हैं। प्रत्येक पौधे पर भी फूल एक साथ आने प्रारम्भ नहीं होते हैं। अतह पुरी फसल एक साथ नहीं पकती है फूल या गूलर जैसी पकने पर प्रारम्भ होते हैं ,उनको तोड़ लिया जाता है। गूलर की चौड़ाई को ही चुनाई कहते हैं।
उपज(Yield)-
कपास की फसल में सिंचित क्षेत्र में अच्छे दिख रहे करने पर 10 से 12 कुंतल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त हो जाती है। या शुष्क क्षेत्रों में साक्षी 8 कुंतल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त हो जाती है।
फसल चक्र(Crop Cycle)-
कपास--- बरसीम
कपास-- मटर
कपास-- आलसी
कपास-- चना +कपास --गेहूं 2वर्ष
कपास की खेती pdf
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