
गाजर की खेती
गाजर (CARROT)
Botanical Name- Daucus Carota L.
Family- Umbellifereae
प्रस्तावना-
गर्मी में गाजर की खेती करने का सही तरीका जानलो, गर्मी में गाजर की खेती, छोटे किसानों के लिए फायदेमंद है। गर्मी में गाजर की खेती को मात्र 70 दिन में तैयार करे इसकी खेती सम्पूर्ण भारत में मनुष्यों के उपभोग के लिये तथा साथ ही पशुओं के चारे के लिये की जाती है। यह घोड़ों का अच्छा आहार है। यह कच्चे तथा पका कर एवं करी (Curries) में प्रयोग की जाती है। इसका अचार, मिठाइयाँ जैसे हलवा, गाजर पाक (Gajar Pak) तथा गजरेला बनाया जाता है।
इनका जन्म स्थान मध्य एशिया में पंजाब तथा काश्मीर की पहाड़ियों पर (Central Asia in the Hills of Punjab and Kashmir) बताया है तथा इसके वितरण का दूसरा केन्द्र एशिया यूरोप और उत्तरी अफ्रीका (North Africa around the Mediterranean) बताया जाता है।
प्रजातियाँ (Varieties) -
मूली और शलजम की तरह इसको भी दो समूहों में बाँटा जाता हैं-
(A) Temperate or European विदेशी किस्में- यह द्विवर्षीय होती है।
(B) Tropical or Asiatic Type देशी किस्में - यह एक वर्षीय होती है। इसके अन्दर विभिन्न रंगों को काली (Black) लाल (Red) तथा पीली (Yellow) प्रजातियाँ पायी जाती हैं। इसकी खेती दूसरी जातियों की अपेक्षा शीघ्र की जा सकती है। साथ ही यह अधिक रस वाली (More Juicy) होती है।
(1) पूसा केसर (Pusa Kesar) -
Cross Between--
Temperate Type x Tropical Type
(Nantes) | (Local Red)
(Half long) ↓
Pusa kesar
(Behaves like a tropical Type)
(2) नं० - 29 (No. - 29)
(3) सेलेक्सन 233 (Selection 233)
(4) सेलेक्सन - 21 (Selection-21)
(5) सेलेक्सन-5 (Selection-5) पूसायमदग्नि
(6) पूसा मेघाली
(7) हाइब्रिड- 1 (H.C.-1)
(A) Temperate Type- यह नारंगी रंग (Orange Colour) की होती है। इसकी प्रजातियाँ
निम्न हैं-
(1)नैन्टस (Nantes)
(2) हाफ लॉंग नैन्टस (Half long Nantes)
(3) कोरलेस (Coreless)
(4)चैनटेनी (Chantaney)
(5) इम्परेटर (Imperator)
(6) स्ट्रीमलाइन्स (Streamlines)
(7) डानवर्स ( Danvers)
(8) गोल्डन हार्ट (Golden Heart )
(9) इण्डियन लॉंग रैड (Indian long Red)
(10) काश्मीर ब्यूटी (Kashmir Beauty)
गाजर की अधिक उत्पादन वाली किस्म- पूसा यमदग्नि
गाजर की प्रमुख प्रजातियों का विवरण-
1. पूसा मेघाली- इस प्रजाति को आई० ए० आर० आई० द्वारा विकतिस किया गया है। जड़ों का रंग व गूदा नारंगी होता है। ये चिकनी व कैरोटीन की मात्रा, पूसा केसर की तुलना में अधिक होती है। इसकी बुवाई वर्ष ऋतु में की जाती है। इसकी जड़ें बुवाई के 110-120 दिन बाद कटाई योग्य हो जाती है।
2. पूसा केसर—यह प्रजाति स्थानीय लाल (Local red) तथा नैनटिस (Nantes) के मिलाप से तैयार की गई है। जड़ों की बनावट शंक्वाकार होती है जिनका रंग लाल होता है यह अगेती किस्म है जिसकी उपज 200-250 प्रति हैक्टेयर होती है। यह बीज बोने के 3 माह उपरान्त कटाई योग्य हो जाती है।
3. गाजर नं० 29 - यह अगेती किस्म है। इसकी जड़ें हल्की लाल तथा लम्बी होती है। इसका बीज मैदानों में आसानी से तैयार किया जा सकता है। इसकी पैदावार प्रति हैक्टेयर 250-300 कुन्तल होती है। 5. एच० सी०- 1- इसकी जड़ों का रंग हल्का लाल होता है। पैदावार 250-300 कुन्तल प्रति है० होती है। फसल तैयार होने में चार माह लेती है।
4. सलैक्शन 233 (S-233) — इसकी जड़ें 15-20 सेमी लम्बी मीठी नारंगी रंग वाली होती है। फसल दो माह में तैयार हो जाती है। उपज 250 कुन्तल औसदन प्रति है० होती है।
5. नैनटिस (Nantes)- इसकी जड़ों का रंग नारंगी तथा आकार बेलन की तरह होता है। अगला सिरा छोटा पतला होता है। पैदावार लगभग 200 कुन्तल प्रति है० होती है। फसल 100-115 दिनों में तैयार हो जाती है। मैदानी क्षेत्र में इसका बीज तैयार नहीं किया जा सकता है 1
6. चैन्टनी (Chantaney) - जड़ों का गहरा लाल, नारंगी होता है। जड़ों की मोटाई अधिक होती है। इसकी पैदावार कुछ कम 150-160 कुन्तल प्रति है० होती है। फसल बोने के 80-90 दिनों बाद तैयार होती है। मैदानी भाग में इस प्रजाति का बीज तैयार किया जा सकता है।
जलवायु (Climate) -
यह ठंडे मौसम (Cool season) की फसल है, फिर भी कुछ Tropical Types जातियाँ अधिक तापक्रम के लिये भी सहनशील हैं। जड़ों का रंग एवं उनका विकास तापक्रम से विशेष प्रभावित होता है। गाजर जो 10-15° से० तापक्रम पर उगायी जाती है, उसका रंग अच्छा नहीं होता है। वह गाजर जो 15 से 20° से० पर उगायी जाती हैं, उसका रंग अच्छा होता है। जबकि 22-25° से० तापक्रम पर उगाई हुई गाजर का रंग कम चमकीला होता है। अधिक तापक्रम में जड़े छोटी होती हैं, तथा कम तापक्रम में जड़े लम्बी होती हैं। वैसे जड़ों का छोटा-बड़ा होना भूमि की दशा एवं प्रजाति पर निर्भर होता है।
भूमि (Soil) -
गाजर के लिये गहरी, भुरभुरी, ढीली दोमट मिट्टी अच्छी होती है। अधिक अम्लीय भूमि इसकी खेती के लिये उपयुक्त नहीं होती है। इसके लिये सर्वोत्तम पी० एच० 6-5 या इसके आस-पास है।
बोने का समय (Sowing Time ) -
(1) मैदानी भागों में गाजर की बोवाई मध्य अगस्त से प्रारम्भ करके दिसम्बर तक की जाती है। (2) पहाड़ी क्षेत्रों पर इसकी बोवाई मार्च से जुलाई तक की जाती है
(3) Temperate or European type या विदेशी जातियों की बोवाई अक्टूबर में या इसके बाद की जाती है।
(4) Tropical or Asiatic type या देशी जातियों की बोवाई पहले की जाती है, जबकि तापक्रम बहुत अधिक रहता है। इसकी बोवाई सितम्बर से अक्टूबर तक की जाती है।
बीज की मात्रा (Seed Rate)-
5-6 किलोग्राम बीज एक हेक्टर की बोवाई के लिये पर्याप्त होता है।
बोने का ढंग (Method of Sowing)-
गाजर की बोवाई दोनों प्रकार से की जाती है—
(1) चौरस खेत में : कतार से कतार की दूरी 20-30 से० मी० पौधे से पौधे 8 से 10 से० मी० ।
(2) मेड़ों पर (On ridges): कतार से कतार की दूरी 45 से० मी० तथा बोने की गहराई 1.5 से० मी० होनी चाहिये। इसके बीज छोटे होते हैं अतः बोने से पहले इसके बीजों को बालू या राख के साथ मिला लेना चाहिये। इसकी बोवाई
खाद एवं उर्वरक (Manures and Fertilizers ) -
60 कि०/हेक्टर नत्रजन
60 कि०/हेक्टर फास्फोरस
80-100 कि०/हेक्टर पोटाश
खाद एवं उर्वरक
नत्रजन
फास्फोरस
पोटाश
उर्वरक की मात्रा प्रति हेक्टर
60
60
80-100
गाजर की फसल पोटाश की अधिक मात्रा चाहने वाली फसल है। ऐसा अनुमान किया जाता है कि एक 275 कुन्तल / हेक्टर पैदावार देने वाली फसल 40 कि० नत्रजन, 22.5 कि० फास्फोरस तथा 125 कि. पोटाश का ह्रास करती है।
अच्छी सड़ी गोबर की खाद, 30 टन प्रति हेक्टर की दर से बोने से पहले मिट्टी में मिला देनी चाहिये। ताजी या कम सड़ी हुई गोबर की खाद प्रयोग करने से गाजर की जड़ों में शाखायें निकल आती हैं। अतः ताजे गोबर का प्रयोग नहीं करना चाहिये। इसके बाद भूमि की उर्वरता के अनुसार नत्रजन, फास्फोरस और पोटाश का प्रयोग करना चाहिये। फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा तथा नत्रजन की आधी मात्रा बोने से यशले खेत तैयार करते समय तथा नत्रजन की शेष आधी मात्रा बोने के 1-1/1/2 महीने बाद टॉप ड्रेसिंग के रूप में देनी चाहिये इस प्रकार सामान्य रूप से 60 कि० नत्रजन 60 कि. फास्फोरस तथा 80 से 100 कि. पोटाश / हेक्टर की आवश्यकता होती है।
सिंचाई (Irrigation) -
प्रथम सिंचाई बोवाई के तुरन्त बाद करनी चाहिये। तथा इसके बाद दूसरी सिंचाई 4-6 दिन के अन्तर पर करनी चाहिये। इस प्रकार भूमि में उचित नमी को बनाये रखना, अच्छी उपज के लिये आवश्यक है।
कर्षण क्रियायें (Interculture Operation) -
पौधों को प्रारम्भिक अवस्था में खेत को निकाई करके खरपतवार से मुक्त रखना चाहिये। विकास करती हुई (Developing) जड़ों को रंग खराब होने (Decolouration) से बचाने के लिये मिट्टी से ढकते रहना चाहिये।
जब पौधे 8-10 दिन के हो जायें तो इनकी थिनिंग (Thining) करके पौधे से पौधे में आपस की दूरी 5 से 7-5 सेन्टीमीटर कर देनी चाहिये। साथ ही एक स्थान पर एक ही पौधे को विकास करने को छोड़ना। चाहिये। छिटकवाँ (Broadcasting) विधि द्वारा बोयी गयी फसल में थिनिंग की आवश्यकता नहीं होती।
कटाई (Harvesting) –
गाजर की जड़ों का ऊपरी सिरा जब 25 से 3-5 सेन्टीमीटर व्यास का हो जायें तब इनकी खुदाई कर लेनी चाहिये। खुदाई करने से पहले भूमि को थोड़ा नम कर देना चाहिये, जिससे खुदाई में आसानी होती है।
पैदावार (Vield) -
ट्रापीकल टाइप (Tropical type) की पैदावार प्रायः अधिक होती है। इस प्रकार एक हेक्टर से 200 कुन्तल से 250 कुन्तल तक पैदावार प्राप्त की जा सकती है।
बीज उत्पादन (Seed Production) -
मैदानी किस्म की गाजर का बीज उत्पादन भारतवर्ष के मैदानी भागों में तथा पहाड़ी किस्म की गाजरों का बीज उत्पादन पहाड़ों पर किया जाता है। यह परसेचित फसल है, जिसका सेचन मधुमक्खी एवं साधारण मक्खियों द्वारा भी होता है। इसकी पुष्पमंजरी एक कम्पाउण्ड अम्बेल (Compound umbel) के रूप में, जिसे सामान्तया हेड (Head) के नाम से पुकारते हैं, पैदा होती है। इसका बीज उत्पादन निम्न दो विधियों से किया जाता है-
(1) बीज से बीज पैदा करना (Seed to Seed Method),
(2) जड़ से बीज पैदा करना (Root to Seed Method),
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