
राजमा की वैज्ञानिक खेती
Botanical classification
Botanical name- Phaseolus vulgaris
family- Legaminaceae
विश्व में उगाई जाने वाली दलहनी फसलों में प्रोटीन की गुणवत्ता के आधार पर मूंगफली तथा मूंग के बाद राजमा तीसरी महत्वपूर्ण दलहनी फसल है। rajma ki kheti kab hoti hai - नवंबर के पहले और दूसरे पखवाड़े में राजमा की कृषि भारत के मैदानी तथा पर्वतीय दोनों ही क्षेत्रों में की जाती है।
महत्व एवं उपयोग (Important and Utility )-
राजमा की खेती भारत में 1 नकदी फसल के विकल्प के रूप में की जाती है । राजमा के दानों में 20. 5% प्रोटीन, 61. 7% कार्बोहाइड्रेट्स तथा 1.5 से 2.0% वसा पाई जाती है। राजमा मैदानों में खनिज तथा विटामिन बी कंपलेक्स भी पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है।
राजमा की हरी फलियों की सब्जी बनाई जाती है । तथा दाने का उपयोग दाल बनाने के लिए किया जाता है। राजमा का हरा चारा पशुओं के लिए प्रोटीन का उत्तम स्रोत माना जाता है।
उत्पत्ति एवं इतिहास (Origin and History)-
राजमा की उत्पत्ति स्थान संयुक्त राज्य अमेरिका है। क्योंकि यह USA में राजमा की लगभग 30 जातियां पाई जाती है। जिसमें स्कारलेट रबड़ वीन (Phaseolus coccineus),टेपेरीवीन(Phaseolus actuifolius), लीभा वीन(Phaseolus lunatus),चीर लौंग(Phaseolus polyanthus) तथा कामन वीन (Phaseolus valgaris) हम जनरल कौन थे किन्हीं पांच प्रमुख है।
क्षेत्रफल तथा वितरण (Area and Distribution)-
विश्व में राजमा की खेती संयुक्त राज्य अमेरिका में अधिक मात्रा में की जाती है। इसी खेती का प्रचलन भारत तथा फ्रांस में अब हो गया है।
उत्तर भारत के पहाड़ी क्षेत्र जैसे- हिमाचल ,प्रदेश जम्मू एवं कश्मीर तथा उत्तराखंड में राजमा खरीफ ऋतु तथा मैदानी क्षेत्र जैसे- पंजाब ,हरियाणा ,उत्तर प्रदेश ,बिहार में इसकी खेती रबी मौसम में की जाती है।
जलवायु(Climate)-
राजमा की खेती मैदानी क्षेत्र से लेकर समुद्र तल से 2000 मीटर तक की ऊंचाई वाले क्षेत्र में सफलतापूर्वक की जाती है। राजमा की फसल के लिए 15°C तथा 30°C तापक्रम अनुकूल माना जाता है।
मृदा(Soil)-
राजमा की खेती के लिए दोमट मृदा उपयुक्त मानी जाती है। यहां लेटराइट मृदा तथा उत्तर भारत की जलोढ़ मृदा में आसानी से हो जाती है । राजमा की खेती के लिए 6 - 7. 5 पी० एच० मान वाली उर्वरा भूमि उपयुक्त मानी जाती है।
भूमि की तैयारी (Field preparetion)-
राजमा की खेती के लिए पहले जूताई मिट्टी पलट हल उसके उपरांत 2-3 जुताई हैरो की तथा कल्टीवेटर से करने के बाद खेतों में एक रूटर चलाकर चलाकर खेत को समतल कर लिया जाता है।
राजमा की उन्नतशील जातियां (Rajmah Improved varieties)-
उदय(PDR 14)- यहां प्रजाति भारत में विकसित राजमा की प्रथम प्रजाति है। यह प्रजाति पूर्वी उत्तर प्रदेश ,बिहार, पश्चिम बंगाल और असम के लिए उपयुक्त है। दानों का रंग लाल चित्तीदार होता है। दाने काफी बड़े होते हैं यहां 120 से 130 दिन में पक कर तैयार हो जाती है। तथा उपज 20 से 25 कुंटल प्रति हेक्टेयर दे देती है।
उत्कर्ष (IPR 98-5)- राजमा कि यहां पर जाती आईआईपीआर (IIPR) कानपुर से विकसित की गई है। इस प्रजाति के दाने उत्कर्ष लाल रंग के होते हैं । इसके उपज क्षमता अपेक्षाकृत 17 कुंटल प्रति हेक्टेयर होती है। यहां पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड तथा पश्चिम बंगाल के लिए उपयुक्त है।
आई०पी०आर० 98 -3 -1(IPR 98-3-1)- यहां प्रजाति गुजरात, महाराष्ट्र , मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ के उत्पादन के लिए उपयुक्त है। इसकी औसत उत्पादकता 16 से 18 कुंतल प्रति हेक्टेयर होती है।
HUR 203 - रवि मौसम में उगाई जाने के लिए यहां प्रजाती उपयुक्त मानी जाती है। यहां महाराष्ट्र, गुजरात, छत्तीसगढ़ के लिए संस्कृत की गई है । इसकी उपज 17 से 18 कुंतल प्रति हेक्टेयर मिल जाती है।
मालवीय राजमा 15(HUR 15)- यहां प्रजाति मध्य एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार पश्चिम, बंगाल तथा आसाम में रवि के मौसम में उत्पादन के लिए उपयुक्त है । दानों का रंग धूसर सफेद होता है। प्रजाति 115 से 120 दिन में पक कर तैयार हो जाती है। इसकी उत्पादन क्षमता 18 से 20 कुंतल प्रति हेक्टेयर होती है।
इसके अलावा अम्बर(IIPR 96-4) तथा बी० एल० 63 यहां जाति 120 से 125 दिन में पक कर तैयार हो जाती है। और इसके उत्पादन क्षमता 25 से 30 कुंटल प्रति हेक्टेयर होती है।
बीज उपचार,(Seed Treatment )-
राजमा की फसल में मृदा तथा बीज जनित बीमारी का प्रकोप से बचने के लिए कार्बेंडाजिम द्वारा 2. 5 ग्राम रसायन प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए।
बीज दर (Seed rate)-
राजमा की फसल में 2.5 से 3.0 लाख पौधे प्रति हेक्टेयर होने चाहिए। राजमा की फसल के लिए 120 से 130 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर बीज आवश्यकता होती है।
अंतरण(Spacing)-
उत्तर भारत में पंक्ति से पंक्ति 40 से 45 सेंटीमीटर तथा पौधा से पौधा 10 सेंटीमीटर रखनी चाहिए।
पूर्वोत्तर भारत में पंक्ति से पंक्ति 30 सेंटीमीटर तथा पौधे से पौधा 15 सेंटीमीटर रखा जाता है।
बुवाई का समय(Time of Sowing)-
उत्तर पूर्वी भारत में राजमा की बुवाई का उपयुक्त समय अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से लेकर नवंबर के प्रथम सप्ताह तक है । पूर्वोत्तर राज्य में राजमा की रबी फसल की बुवाई अगस्त के प्रथम सप्ताह से सितंबर के देते सप्ताह तक कर दी जाती है।
उत्तर भारत के पर्वतीय क्षेत्र में राजमा की फसल खरीफ ऋतु में उगाई जाती है।
बुवाई की विधि(Method of showing)-
राजमा की बुवाई सदा पंक्ति में की जाती है तथा बीजों को हमेशा कुंडों में बुवाई करते है। बुवाई के समय मृदा की नमी की प्राप्त मात्रा होनी चाहिए। बीजों का जमाव के लिए अच्छा माना जाता है।
खाद एवं उर्वरक(Manners and fertilizers)-
राजमा की फसल के लिए 10 टन सड़ी गोबर की खाद तथा कंपोस्ट को बुवाई के 10 से 15 दिन पूर्व खेत में बिखर कर अच्छी प्रकार से मिला देनी चाहिए।
उत्तर भारत में राजमा की फसल को 100 से 120 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 से 60 किलोग्राम फास्फोरस तथा 30 से 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है।
पूर्वोत्तर भारत में सब्जी के लिए उगाए जाने वाले राजमा की फसल में 130 किलोग्राम यूरिया, 375 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट तथा 80 किलोग्राम म्यूरेट आफ पोटाश डालनी चाहिए।
सिंचाई प्रबंध(Irrigation management)-
राजमा की फसल केवल सिंचित क्षेत्र में ही उगाई जाती है। राजमा की फसल का 3 से 4 सिंचाई की आवश्यकता होती है। सिंचाई 25 से 28 दिन के अंतराल पर करनी चाहिए। सिंचाई का विशेष ध्यान फूल आते समय तथा फली बनते समय रखनी चाहिए।
खरपतवार नियंत्रण(Weed management)-
खरीफ ऋतु में उगाई जाने वाली राजमा की फसल में खरपतवारो का प्रकोप प्रकोप अधिक होता है। पहले निराई गुड़ाई फसल बोने के 25 से 30 दिन के उपरांत कर देनी चाहिए। तथा दूसरी निराई गुड़ाई बुवाई के 55 से 60 दिन के अंदर पर करनी चाहिए।
खरपतवार नाशी रसायन जैसे पेंडीमैथलीन , ऑक्सी क्लोरोफिन तथा फ्लूक्लोरेलिन काफी प्रभावशाली है। फ्लूक्लोरेलिन की एक किलोग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर से फसल की बुवाई के पूर्व 600 से 800 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव कर देनी चाहिए। तथा पेंडीमैथलीन 1.25 किलोग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर से 600 से 800 लीटर पानी में घोलकर फसल की बुवाई के तुरंत पश्चात छिड़काव करनी चाहिए। यहां चौड़ी पत्ती के लिए होता है।
पादप सुरक्षा-
रोग नियंत्रण(Disease Control)-
स्तम्भ मूल संधि विगलन(Root-stem Juncture rot)-
राजमा की फसल में यहां बीमारी स्केलेरोशियम रोलफसाई नामक कवक द्वारा फैलती है। रोग ग्रसित पौधे की पत्तियां अचानक मुरझाए ही दिखाई देती है। अंत में पौधा सूखने लगता है। स्तम्भ मूल संधि के पास और इसके आगे पौधे के अन्य भागों पर रूई जैसा सफेद कवक जाल दिखाई देता है।
रोकथाम - रोग ग्रसित पौधे को उखाड़ कर नष्ट कर देनी चाहिए ।
बीजों को बोलने से पूर्व उपचारित करके बोना चाहिए।
राजमा की फसल में इस रोग का प्रकोप होते ही थायोफीनेट मिथाइल अथवा कार्बेंडाजिम का 0. 2% घोल का छिड़काव पौधे के पास जमीन की सतह में करने से बीमारी का नियंत्रण हो जाता है।
एन्र्थेक्नोज(Anthracnose)-
यहां रोग Colletotricum lindemuthianum नामक कवक के द्वारा फैलता है। उत्तर पूर्वी तथा उत्तर पश्चिमी हिमालय की पहाड़ियों में इस रोग का प्रकोप अधिक होता है। इस रोग का प्रकोप उस समय अधिक लगता है जब वायुमंडल में तापमान 20 से 27 डिग्री सेंटीग्रेड तथा आद्रता 70% से अधिक होती है।
रोकथाम - 1)रोगी पौधे को खेत में दिखाई देने पर उखाड़ कर फेंक देना चाहिए।
2)कम से कम 2 से 3 वर्ष तक फसल चक्र अपनाने चाहिए।
3)कार्बेंडाजिम तथा थीरम 2.5 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिए।
4)कवकनाशी रसायन जैसे बेनोमाइल,जिराम अथवा काबोक्सीन राजमा की खड़ी फसल में छिड़काव करने से इस रोग का प्रभावी नियंत्रण हो जाता है।
5) राजमा के रोग रहती प्रजातियां जैसे के०आर०सी०1, के०आर०सी० 17, जी०233, ई०सी० 42960 आदि प्रमुख है।
रतुआ (Rest)-
राजमा की फसल में यहां रोग Uromyces appendicular is नामक कवक द्वारा फैलता है । राज्यों में यह रोग दक्षिण भारत में मुख्य रूप से लगता है। इस रोग के कारण राजमा की फसल में 10 से 70% तक की हानि हो जाती है।
रोकथाम - इसकी रोकथाम के लिए रोग रोधी जातियों का चयन करनी चाहिए जैसे एच आर 15 1, आईआईएचआर 231, आईआईएचआर 220 आदि।
राजमा की फसल में इस रोग का प्रकोप होते ही थायोफीनेट मिथाइल अथवा कार्बेंडाजिम का 0. 2% घोल का छिड़काव पौधे के पास जमीन की सतह में करने से बीमारी का नियंत्रण हो जाता है।
कोणीय पर्ण चित्ती (Angular Leaf Spot)-
राजमा की फसल में यह रोग मुख्यता Isoariopsis griseola नमक कवक के द्वारा फैलता है । इस रोग का प्रकोप मुख्यता पर्वती क्षेत्र में होता है । जिसमें राजमा की फसल में 40 से 70% तक की उपज हानि हो जाती है। पत्तियों पर मुख्य रूप से इस रोग में धब्बे पाए जाते हैं।
रोकथाम - 1)रोगी पौधे को खेत में दिखाई देने पर उखाड़ कर फेंक देना चाहिए।
2)कम से कम 2 से 3 वर्ष तक फसल चक्र अपनाने चाहिए।
3)कार्बेंडाजिम तथा थीरम 2.5 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिए।
4)कवकनाशी रसायन जैसे बेनोमाइल,जिराम अथवा काबोक्सीन राजमा की खड़ी फसल में छिड़काव करने से इस रोग का प्रभावी नियंत्रण हो जाता है।
5)राजमा के रोग रोधी प्रजातियां जैसे आईएचआर 42-2, हिम 11 ,हिम 12, पी डी आर 14 , कैनेडियन राउंड, तथा कैनेडियन लोंग रेड का चयन करना चाहिए।
विषाणु रोग (Viral Disease)-
राजमा की फसल में कई विषाणु जनित रोगों मे बीन कॉमन मोजेक विषाणु रोग का सबसे अधिक प्रकोप होता है। इसरो के संक्रमण से पत्ते पर हल्के हरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। जिससे पत्तियां निरूपित हो जाती है। इसरो के संक्रमित पौधे की वृद्धि रुक जाती है जिससे पौधा बना रह जाता है।
रोकथाम - 1)सदा प्रमाणित बीज को ही बुआई करनी चाहिए।
2)माहू कीट के नियंत्रण के लिए ऐसीफेट अथवा थायोडान का समय पर छिड़काव करना आवश्यक है।
3) राजमा की अंबर प्रजाति इस रोग के लिए अवरोधी है।
कीट नियंत्रण (Insect Control)-
लिफ हापर अथवा फुदका(Leaf Hopper -Empoasca)-
देश के मैदानी क्षेत्र में इस कीट का प्रकोप फरवरी के मध्य से शुरू होता है। इस कीट का प्रकोप अधिक होने पर पौधे की पत्तियां मुड़ जाती है तथा यहां के पौधों का रस चूसते हैं। जिससे पौधे बोने रह जाते हैं।
रोकथाम - कार्बोफ्यूरान 0.7-1.0 किलोग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर से 600 लीटर पानी में घोल बनाकर फसल में 30 से 40 दिन के अंदर छिड़काव कर देना चाहिए । इसके अतिरिक्त मेटासिस्टॉक्स का 0.03 प्रतिशत घोल का छिड़काव करने से इस कीट का नियंत्रण हो जाता है।
कटुआ(Cutworm)-
यहां कीट रात में पौधे को भूमि की सतह से ही काट देता है। कटे हुए पौधे को घसीट कर ले जाता है बड़े पौधे में यह कीट तने को काट देता है। जिससे पौधा गिर जाता है अथवा सूख जाता है।
रोकथाम- मेटासिस्टाक्स की 0.03 प्रतिशत घोल का छिड़काव करने से इस कीट का नियंत्रण हो जाता है। फोरेट10 जी की 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के पूर्व खेत में छिड़काव करने से इस कीट का प्रकोप नहीं होता है।
तना मक्खी(Stem fly)-
तना मक्खी यहां एक हानिकारक कीट है। इसका प्रकोप मुख्यतः सोयाबीन, मूंग, उड़द ,चना, अरहर ,तंबाकू आदि फसलों में होता है। यहां मख्खी भूमि के पास तने के अंदर प्रवेश कर जाती है। तने के अंदर जाकर पीपा तथा सुंडी अवस्था पूर्ण करती है। यहां फसलों को अधिक हानि पहुंचाती है।
रोकथाम- राजमा की समय से बुवाई करनी चाहिए।
स्केट का प्रकोप शुरू होते ही क्लोरोपाइरीफास का 0. 5% क्विनालफास का 0.3 प्रतिशत ऑक्सीडेमेटोन मिथाइल का 0.3 प्रतिशत के घोल में का 15 दिन के अंतराल पर दो बार छिड़काव करना चाहिए।
माहूं(Aphids)-
राजमा की फसल में माहू कीट का प्रकोप अधिक होता है। यहां की पौधे का रस चूसता है । तथा फूलों का रस चूसता है इसके अधिक प्रकोप होने से पौधे की वृद्धि रुक जाती है। इस कीट से कई बार विषाणु जनित रोग का प्रकोप हो जाता है।
इसकी रोकथाम के लिए भूमि में कार्गो कार्बोफ्यूरान एक किलोग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें।
इस कीट का आक्रमण शुरू होने के पश्चात मोनोक्रोटोफॉस का 0.03 प्रतिशत अथवा एसीफेट का 0.0 4% घोल का 15 दिन के अंतराल पर दो बार छिड़काव करने से इस कीट का नियंत्रण हो जाता है।
कटाई तथा मंड़ाई (Harvesting and Threshing)-
जब राजमा के पौधे की पत्तियां पीली पढ़कर सूखने लगते हैं। उस समय फसल पकने का संकेत दे देती है । राजमा की फसल पकने पर पौधे की लगभग समस्त पत्तियां झड़ जाती है। तब फसल की कटाई कर लेनी चाहिए । फसल की कटाई सुबह के समय जब ओस पड़ी हंसिआ के सहयता से कटाई करते हैं।
सूखी फसल की मड़ाई डंडे बलों द्वारा अथवा मड़ाई यंत्र की सहायता से की जाती है। राजमा की मड़ाई करने के पश्चात हवा की सहायता से भूसे से दानों को अच्छी प्रकार से साफ कर लेते हैं।
राजमा के बीजों का भंडारण से पूर्व अच्छी प्रकार से सूखा लेना चाहिए जब दानों में 10 से 12% तक नमी रह जाति है उसी समय भंडारण करना उपयुक्त होता है।
सब्जी के लिए फलियों की तुड़ाई नरम अवस्था पर करनी चाहिए। राजमा की फसल की बुवाई के 40 से 45 दिन पश्चात सब्जी के लिए पहली तुड़ाई हो जाती है। फलियो की प्रथम तोड़ाई के पश्चात 4 से 5 दिनों के अंतराल पर तोड़ाई करते रहना चाहिए।
उपज(Yield)-
राजमा की फसल की अच्छी देखरेख करने पर 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है।
राजमा की हरी फलियों की उपज 50 से 70 कुंटल तथा बीज 8 से 15 कुंटल प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त हो जाता है।
rajma ki kheti kab hoti hai
Question & Answer-
राजमा किस महीने में लगाया जाता है?
राजमा पहाड़ी क्षेत्रों में खरीफ की फसल है, लेकिन यह मैदानी क्षेत्रों में रबी के मौसम में भी उगाई जाती है। यदि सिंचाई के साधन उपलब्ध हों तो इसकी बुआई भी फरवरी में की जाती है।
राजमा कैसे उगाएं?
राजमा करीब 120 से 130 दिन में पक कर तैयार हो जाता है. फिर नमी को दूर करने के लिए फसल को 3 से 4 दिन धूप में सुखा लें। जब इसके बीजों में नमी 9 से 10 प्रतिशत तक पहुंच जाए तो दानों को भूसे से अलग कर लेना चाहिए। ध्यान रखें कि अधिक सुखाने से फली से बीज गिरना शुरू हो सकते हैं और बीज बिखरना शुरू हो सकते हैं।
राजमा किस महीने में लगाया जाता है?
राजमा पहाड़ी क्षेत्रों में खरीफ की फसल है, लेकिन यह मैदानी क्षेत्रों में रबी के मौसम में भी उगाई जाती है। यदि सिंचाई के साधन उपलब्ध हों तो इसकी बुआई भी फरवरी में की जाती है।
भारत में सबसे अच्छी फलियाँ कहाँ उगाई जाती हैं?
राजमा भारत के उत्तरी राज्यों के साथ-साथ पाकिस्तान और नेपाल में भी एक लोकप्रिय व्यंजन है। कहा जाता है कि कुछ सबसे अच्छी फलियाँ उत्तरी भारतीय राज्यों हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू और कश्मीर के जम्मू क्षेत्र में उगाई जाती हैं।
राजमा कहाँ उगाया जाता है?
यह महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश, यूपी, जम्मू-कश्मीर और उत्तर पूर्वी राज्यों में 80-85 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में उगाया जाता है। हालाँकि, रबी और गर्मियों के दौरान इसकी खेती उत्तर भारतीय मैदानी इलाकों में भी लोकप्रिय हो रही है।
राजमा कैसे उगाया जाता है?
बेहतर उपज के लिए आदर्श तापमान 15°C से 25°C है। लाल फलियाँ उगाने के लिए मिट्टी की आवश्यकता लाल फलियाँ विभिन्न प्रकार की मिट्टी में उगती हैं। हालांकि, अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी इसकी खेती के लिए सबसे अच्छी होती है। फसल लवणता के प्रति बहुत संवेदनशील है और बेहतर उपज के लिए मिट्टी का पीएच 5.5 से 6.0 होना चाहिए।
राजमा उगाने के लिए कितना पानी चाहिए?
बीजों के अंकुरित होने और अंकुरित होने के बाद सप्ताह में कम से कम एक बार बीन्स को पानी देना चाहिए। आम तौर पर बारिश या सिंचाई से प्रति सप्ताह 1 इंच पानी पर्याप्त होता है, लेकिन मौसम और मिट्टी की गुणवत्ता के कारण मिट्टी जल्दी सूख सकती है। हर दो या तीन दिन में मिट्टी को महसूस करें और अगर यह सूखने लगे तो पानी दें।
राजमा का तासीर कैसा है?
आपको बता दें कि राजमा तासीर गर्म होती है. सर्दियों के मौसम में राजमा खाना सेहत के लिए काफी फायदेमंद माना जाता है. वास्तव में, बीन्स विटामिन सी, प्रोटीन, फाइबर, कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम और फोलेट जैसे कई विटामिन और खनिजों से भरपूर होते हैं। राजमा के सेवन से शरीर को कई फायदे मिल सकते हैं।
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